Monday, December 6, 2010

गीत कोई परंपरा का

 
दिन लिहाफ ओढ़े
उनींदा सा
सूरज का तेज़ छुपा कर
सुस्ता रहा है
यूँ तो
 
फिर भी
हवा में
गति की पुकार
बढ़ती जा रही है
 
धीरे धीरे हिलती पत्तियों में
गीत कोई परंपरा का
खोल रहा है
दिन के नाम लिखे
पुराने ख़त
 
और मैं
आसमान में
नन्हे- नन्हे बादलों के बीच
खोज रहा हूँ
वो किरण
जिसे लेकर
खुद तक पहुँचने की 
तैय्यारी करनी है
आज मुझे

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
सोमवार, ६ दिसंबर २०१० 

3 comments:

प्रवीण पाण्डेय said...

प्राकृतिक बिम्ब मन की बातें बताते हुये।

वन्दना said...

बहुत ही गहन अभिव्यक्ति।

Ashok Vyas said...

धन्यवाद प्रवीणजी और वंदनाजी

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