Tuesday, December 14, 2010

आनंद मेरा सारथी

 
देकर अमृत का पता
मौन हुआ मुसकाय
मेरा होकर मोहना
मुझ में ही छुप जाय


आनंद मेरा सारथी
मंगल मधुर विहार
पग पग ऐसी मौज है
खिलता जाए प्यार


गीत वही उगता यहाँ
जिसमें प्रेम अपार
सबसे अपनापन सजे
साँसों में वो सार


चल चल ले विश्वास तू
फैला दे उजियार
छक कर पी ले रात-दिन
दिव्य प्रेम रसधार


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
मंगलवार, १४ दिसंबर 2010

1 comment:

प्रवीण पाण्डेय said...

उसी छिपे अमृतमयी मोहना को ढूढ़ना है।

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