Wednesday, December 15, 2010

साक्षी हो तुम

 
तुम्हारे जाने के बाद
यह जो बच रहता है
एक निर्वात सा
इसे भरने
फिर फिर बुलाता हूँ
तुम्हारी पावन स्मृति

जाग्रत करने
शाश्वत प्रेम के स्पंदन
परतों के पीछे छुपे सत्य को छू लेने 
कभी शब्दों के साथ
कभी मौन में
करती है जो यात्रा
मेरी चेतना
 
ना जाने क्यूं
लगता है
साक्षी हो तुम
मेरे इस अभ्यास के

पर यह
जो तुम्हारे साथ होने
और तुमसे परे होने का अंतर है
क्या इसे पूरी तरह पाट सकता है
श्रद्धा और समर्पण का सूक्ष्म सेतु?


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
१५ दिसंबर २०१०, बुधवार


2 comments:

प्रवीण पाण्डेय said...

निर्वात भरना भी हो तो सद्विचारों से ही भरे।

Anonymous said...

It's wonderful Ashokji I liked it. I love you because you remind me my Sadguru.

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