Thursday, December 16, 2010

तरंगित अनंत की ताल


अब मौसम आवारा
लौट रहा दोबारा
घूंघट हटा कर
बह निकली धारा


फिर छूट रहा किनारा
समर्पण लगे है प्यारा
सुनसान वादियों में भी
गुनगुनाये बोध तुम्हारा


ढलान पर फिसलन से बचाए
चिर मुक्ति गीत कौन गाये 
ये किसकी पकड़ है
जो हर बंधन से छुडाये


समेट कर अनाम उछाल
साध कर अपनी चाल
लो मुखरित कृपा नृत्य
तरंगित अनंत की ताल


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
गुरुवार, १६ दिसंबर २०१०



1 comment:

प्रवीण पाण्डेय said...

हरि अनन्त, हरि कथा अनन्ता।

वहाँ जो मौन है सुंदर

वह जो लिखता लिखाता है कहाँ से हमारे भीतर आता है कभी अपना चेहरा बनाता कभी अपना चेहरा छुपाता है वह जो है शक्ति प्रदाता  ...