Sunday, December 19, 2010

तू सुन उसे जो अनसुना


उद्विग्न मन
चिंता मगन
क्या सोचता
क्या खोजता
अब छोड़ कर
हलचल सकल
                                               तू मूल का
                                                      पा ले पता

हर सांस में
हस प्यास में
जिसका समर्पण छा रहा
हर आस का
है प्राप्य जो
तू क्यूं उसे बिसरा रहा

अब व्योम में
हर रोम में
तू सुन उसे
         जो अनसुना
है गीत जो
अमृतमयी
मन बस उसे ही 
                   गुनगुना 
मत कर यतन 
बस तज स्वपन
बन कर निरंतर 
       प्रार्थना
जिसके बनाये
जग बना
 बह प्रेम से
उसको मना


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
२० नवम्बर २००८ को रचित
रविवार १९ दिसंबर २०१० को लोकार्पित


1 comment:

प्रवीण पाण्डेय said...

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