Friday, December 10, 2010

चिरमुक्ति द्वार

 
वह सब
जिसे अपना मान कर
इठलाते, इतराते और 
प्रसन्नता में लहलहाते हो
वह सब
जिसको अपना परिचय मान कर
कभी खिल-खिल जाते
कभी कुढ़ते-कसमसाते हो
 
वह सब
यदि किसी एक अनाम क्षण में
छूट जाए अनायास,
क्या तब भी 
रहेगा अपने होने और खुदको 
बनाने वाले पर विश्वास,
 
वह जो सब कुछ देता है 
हम उससे मांगते हैं 
स्थाई रूप से बने रहने का अधिकार 
और अमर हो जाने की 
मांग पर
सदियों से चल रहा है विचार 
 
 
जो अपने किये या ना किये से
बंधे रह जाते
वे नहीं पहुँच पाते उस पार,
कर्मों के बंधन से मुक्त होने की कला
सीख लेते जो
उनके लिए खुल जाता चिरमुक्ति द्वार


अशोक व्यास
शुक्रवार, १० दिसंबर 2010

1 comment:

प्रवीण पाण्डेय said...

जिसे जीवन भर अपना मानते रहते हैं, वह अपना रहता ही कहाँ है।

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