Tuesday, December 28, 2010

समझ के नए सोपान चढ़ने




 
यह कैसे हो जाता है
मन
खाली सलेट सा
जैसे
सुबह की पहली किरण
बिछा दे नई चादर 
घर आंगन पर
नए सिरे से
कुछ रच देने के आमंत्रण के साथ
 
२ 
यह कैसे
समझ के नए सोपान चढ़ने
प्रस्तुत है
मन
जैसे आतुर हो 
कोई शिशु उठा लेने पहला कदम
 
ना जाने किस क्षण 
अब तक का सब जाना हुआ
अब तक का सब सीखा हुआ
हो गया है अर्पित
काल गंगा को

पूरी तरह हल्का होकर
पूरी तरह निर्मल होकर
निर्बद्ध

नए सिरे से
पूर्णता की ओर
चल देने प्रस्तुत हूँ
 
विस्मृत 
सारी खरोचें, सारे घाव
सारी पीडाएं
 
स्वस्थ और मस्त
पूर्ण अपने आप में
अनाम आभा ने
दे दिया है
संपर्क अनायास
 अक्षय प्यार से 
 
अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका
मंगलवार, २८ दिसंबर २०१०






2 comments:

प्रवीण पाण्डेय said...

पूर्णता की ओर बढ़ाया हर पग पूर्ण है स्वयं में।

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

बहुत सुन्दर भाव ...

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