Sunday, February 28, 2010

122 - होली खो जाने को उकसाती है

(द्वारकाधीश मंदिर, न्यू जर्सी, होली २००९, चित्र - रुनझुन अग्रवाल)
१ 

अब जब पहले से भी ज्यादा जरूरी है
आत्मीय स्पर्श का जीवित रहना
और
भावनाओं के मरुस्थल में
रंग रस की मस्ती का बहना

अब दूर रह कर रंगों से
हम जीवन को जान ही नहीं पायेंगे
ठीक है टी वी, इन्टरनेट
पर धडकनों की संगत कैसे पायेंगे

कब तक उधार के सुख दुःख से
अपना सारा काम चलाएंगे
कब खुद अपनी अनुभूतियों से
अपना जीवन थाल सजायेंगे

होली का बुलावा सुन कर भी
क्या बंद कमरों में ठहर जायेंगे
बाहर निकल कर, टोली बनाना जरूरी है
तभी तो हम खुद बन पायेंगे


बनने और बनाने के लिए
ये भी जरूरी है
की बने बनाए पर ही ना इतरायें,
उत्साह का रंग लेकर
कुछ नया सपना देखें 
कोई नया पुल बनाएं,

होली खो जाने को उकसाती है
संकोच से बाहर लाती है
मेल जोल के सौंदर्य का
अनूठा स्वाद चखाती है

 'होली है' कहते हुए जब
किसी के गालों को हमारी
हथेली छू जाती है
उसमें भी आत्मीय तरंग 
की विद्युत सनसनाती है

लो, भर लो अपनी बाँहों में
उल्लास और विस्तार,
गौरवशाली परम्परा जीती है तुममें
और तुमसे जीवन पाती है 

होली की बधाईयों में
जिन जिन की स्मृति आती है या नहीं भी आती है
ये कविता उन सबके नाम
रंग भरी शुभकामनाओं की एक मधुर पाती (चिट्ठी) है


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
रविवार, २८ फरवरी १०
सुबह ८ बज कर ३० मिनट पर




Saturday, February 27, 2010

121- उपहार तुम्हारा ही है

 (स्थान- संवित साधनायन, आबू पर्वत, चित्र- अभय हर्ष)



कहो
कहाँ रख दूं
यह उजला उपहार

जिसमें है सुन्दर सार,
जिससे वैभव अपार,
जिसको छूकर जागे प्यार,
यह
जो है यूँ तो
अपार विस्तार,
पर सूक्ष्म होकर
आ गया फिर एक बार,
कि जीवन बन जाए त्योंहार,
पर करता ही नहीं कोई इसे स्वीकार
देख नहीं पाते शायद, अविश्वास की सीमा रेखा के पार

तो कहो
है कोई जगह
तुम्हारे पास
जहाँ इसे रख कर चला जाऊं मैं?
अच्छा सुनो, 
देख सको तो देख लेना कभी
उपहार तुम्हारा ही है
चाहे फिर आऊं या ना आऊँ मैं

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
शनिवार, २७ फरवरी १०
सुबह १० बज कर ३३ मिनट

Friday, February 26, 2010

120 - पूर्ण आनंद शिखर


१ 
सब कुछ संतुलित हो
समन्वित हो
ऐसा यदि हो भी जाता है 
किसी क्षण 
वो क्षण ठहर नहीं पाता है 

२ 

हम बार बार
साम्य अवस्था से अलग होते हैं 
बार बार 
करते हैं प्रयास 
सम पर आने का,
 बस इतना है 
अभ्यास के साथ 
जल्दी जल्दी तय हो जाती है
यह दूरी

कभी परिहास में
पूछ बैठता हूँ
उससे
वह जो केंद्र है सृष्टि का

'तुम चाहते हो
कब्जा ना करे कोई
तुम्हारे स्थान पर
क्या इसीलिये 
सबको भगाते रहते हो?

समन्वित केंद्र से दूर छिटकाते,
भटकाते, खिझाते, रुलाते,
फिर रास्ता बता कर 
अपने पास बुलाते
पर  फिर
फिसला कर 
इस 'अविचलित केंद्र' से दूर हटाते,

४ 
वो बस 
मुस्कुराता है
लगता हूँ
अगर उसे विश्वास होता
कि मैं समझ पाऊंगा
तो शायद कहता 
'इस 'समन्वित पूर्ण आनंद शिखर तक
पहुँच कर भी जो मुझमें
पूरी तरह नहीं मिल पाता,
वो अपने 'सीमित रूप' का उत्सव मनाने 
खुद ही मुझसे दूर जाता,
व्यवस्था है कुछ ऐसी
जो खुद ना चाहे
मेरे पास नहीं ठहर पाता'


अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका
सुबह ७ बज कर ४ मिनट

Thursday, February 25, 2010

119 - क्या है ऐसा होना


अब भी लगता है
नया नया हूँ धरती पर
इतना कुछ है 
जो देखा नहीं
इतना कुछ है
जो जाना नहीं


अब भी लगता है
शुरुआत होनी है यात्रा की
या शायद
ये एक भ्रम है
कि होगी ही यात्रा
शायद होना ही यात्रा है


क्यों लगता है बार बार
खाना पीना
बोलना, मिलना, कुछ नाम, कुछ पैसा जोड़ लेना ही
होना नहीं है
इस तरह जो जो हुए
वो फिर किसी क्षण
'ना होने' के कगार पर जा पहुँचते हैं


क्या है ऐसा होना
कि जिसके  बाद 
'ना होना' होता ही नहीं?



अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका
गुरुवार, फरवरी २५, १०
सुबह ६:००बजे

Wednesday, February 24, 2010

118- दिन को भेजते हैं चिट्ठियां


दिन को भेजते हैं चिट्ठियां 
पहले तो
कि हमें यहाँ - वहां बुलाना
और फिर
कसमसाते हैं 
जब पड़ता है इधर - उधर जाना


कैसे हो जाता है ऐसा
हम जो हैं, जहाँ हैं
उसी जगह में
कुछ लोग पूर्णता दिखाते हैं

और कुछ लोग 
हममें अभावग्रस्त होने का
नया सा बोध जगाते हैं


सबसे अलग हट कर
क्यों हम अपने आपको
शुद्ध रूप में
देख ही नहीं पाते हैं

किसी ओर से मिल लेते हैं
जब भी खुद से
मिलने का मानस बनाते हैं


प्रश्न तो तीन शब्दों का है
'कौन हूँ मैं?'
पर इसके जवाब में
तीनो काल आकर मिल जाते हैं

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
बुधवार, २४ फरवरी १०
सुबह ८ बज कर ०७ मिनट


'

Tuesday, February 23, 2010

117 कितने सारे मोर्चे हैं


इस क्षण
शब्द रस्सी थाम कर
उतर जाने अपने भीतर के कुएं में
जब धरता हूँ ध्यान
कुआँ खो जाता है
जहाँ 
काली गहराई थी
वहां खुला आकाश हो जाता है


फिर एक बार
लौट कर 
सहज शांत गुफा में 
मन को कैसे विश्वास दिलाऊँ
कि वो नित्य संघर्ष के लिए ही नहीं बना है

कितने सारे मोर्चे हैं
जो बुलाते हैं
भगाते हैं
थकाते हैं
कभी जीत का झंडा दिलाते हैं
कभी रुलाते हैं

इन सब लड़ाईयों के बीच
इस सब हाहाकार के बीच

कैसे रह पाया यह
सहज शांत स्थल सुरक्षित

विस्मय होता है
अपने विस्तार पर

और मौन में फूटता है जो मुझसे
इस निश्छल प्यार पर

अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका
सुबह ७ बज कर १० मिनट
मंगलवार, २३ फरवरी २०१० 

Monday, February 22, 2010

116 - जो जो हम जान लेते हैं


चुनौती होती है अपना सामना करने की
इसलिए नहीं कि हम खतरनाक हैं
बल्कि इसलिए
कि हम
अपने विस्तार की टोह लेते लेते
इतनी दूर निकल जाते हैं
कि खुद अपनी नज़रों की
सीमारेखा पार कर जाते हैं


सोचते हैं
जीवन के पीछे भाग रहे हैं
पर वो क्या जीवन
कि खुद से मिल ही नहीं पाते हैं

३ 

और रोचक बात ये है
कि कोई खुद से मिलने की बात कहे 
तो हम उसे 
अव्यावहारिक बताते हैं

कभी कभी यूं भी होता है
की सोच समझ कर
कहीं पर
अपनी सोच का सौदा कर आते हैं

सौंप कर अपना बहुमूल्य मन
कुछ कंकर, पत्थर बटोर लाते हैं


क्या होता है 
उस सबका
जो कुछ हम जीवन भर
दौड़-धूप कर करके जुटाते हैं

चाहे जहाँ तक पहुंचें
एक दिन आँख बंद करके
लम्बी नींद सो जाते हैं


जब कोई 
इस ना टूटने वाली नींद का जिक्र करे
कभी हम घबराते हैं
कभी इस बोध से पलट जाते हैं

अटल को नकार कर 
टलने वाले सत्य में अटक जाते हैं


तो क्या
बनाने वाले ने हमें
अटकने और लटकने के लिए ही बनाया है
या 
हमारी साँसों में
शाश्वत का कोई 'कोड' भी समाया है



शायद इस कोड में
छुपा है मुक्ति का द्वार,
शायद हम जा सकते हैं
मृत्यु के पार,
और शायद इसे ना जान 
पाने में भी है कुछ सार,
क्योंकी जो जो हम जान लेते हैं
उससे से तो बना लेते हैं दीवार

अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका
२२ फरवरी २०१०, सोमवार
सुबह ७ बजे

Sunday, February 21, 2010

115 उसका भी कुछ सम्बन्ध है हमसे


कभी कभी मौन अपना ऐसे
जैसे शांत साम्राज्य हो अतुलित वैभव वाला
कभी कभी चुप्पी अपनी ऐसी
जैसे गोपाल के पीछे चलता ग्वाला

 इस क्षण और इससे अगले क्षण के बीच 
एक महीन सा उजाला है
इस जगह 
जहाँ समय निश्चल होकर सुस्ताता है
यहाँ पर 
जो अनिर्वचनीय सुन्दरता है
चिड़िया की मधुरतम बोली है
ऐसी शांति है
कि जिसको ढूँढने 
हम एक क्षण से दुसरे क्षण तक दौड़ते रहते हैं हमेशा 
यहाँ मैं ना जाने
कैसे आ गया
और अब यहाँ का चित्र लेकर 
तुम्हे दिखाने का विचार आते ही
फ़ोन आ गया तुम्हारा

लो कालातीत की अनुभूति लेकर
आ गया हूँ
काल की सीमाओं में

जैसे घर की दीवारों में रहते हुए
जानते हैं हम
फैला हुआ है शहर, संसार
घर की सीमा के पार

ऐसे ही
जान गया हूँ
नए सिरे से
काल में हैं हम
पर इस काल से परे भी कुछ है
और
उसका भी कुछ सम्बन्ध है हमसे


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
२१ फरवरी २०१०, रविवार
सुबह ८ बज कर ४८ मिनट

Saturday, February 20, 2010

114 - मुक्ति द्वार पर प्रवेश से पहले


यह जो एक क्षण है
जिसमें खुल सकता है रास्ता मुक्ति का

इस क्षण के लिए

जरूरी है अपनी पहचान
बिना पहचान प्रवेश नहीं

प्रवेश करने के बाद
क्या यही पहचान रहेगी
या उस पार
मिल जायेगी पहचान नयी?
और तब
पहचान के आग्रह से उकता कर
छोड़ ही दिया 
मैंने मुक्ति के द्वार पर
खड़े रहने का विचार
कह दिया जिद में
लाओ दे दो
मुक्ति यहीं 
जहाँ भी मैं हूँ
जैसा भी मैं हूँ
यदि हूँ मुक्ति का अधिकारी
मेरे रूठने से
अगर तुम्हारा कोई सम्बन्ध नहीं
ओ मुक्तिदाता
तो तुम्हारे रूठने से
क्यूं हो मेरा सम्बन्ध कोई?
5
तर्क करते करते 
सहसा 
दिखाई दिया
तर्क के परे
एक उजियारा स्तर
जहाँ प्रश्नों के परे
ना मैं था
ना वो
बस एक था
जो था
जो है
रहेगा यही 
मेरी इस पहचान के तिरोहित हो जाने के बाद
6
हाँ
क्षणभंगुर है
यह पहचान
पर
इसमें भी सामर्थ्य है
शाश्वत को रिझाने की
अपनाने की, देखने की और दिखने की 
लो सहसा
शिकायत नहीं
कृतज्ञता से भर गया 
उसके प्रति
जो मुक्ति द्वार पर प्रवेश से पहले
मुझसे मेरी पहचान पूछता है


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
शनिवार, १९ फरवरी २०१०, सुबह ८ बज कर १९ मिनट 

Friday, February 19, 2010

113 अपना मानने की ताकत

                                              (छायाकार - अशोक व्यास)

बात वो 
जो है तुम्हारी 
नहीं रुकेगी कभी 
रुक सकती नहीं
क्योंकी तुम जीवन हो 
और जीवन गति है

हर वो बात
जो रुक जाती है कहीं 
जान लो 
थी नहीं वो तुम्हारी
बस मान बैठे थे 
उसे तुम अपना 

सारा जीवन
परिभाषित होता है
बस इस एक बात से 
के तुम अपना किसे मानते हो

२ 

तुम्हारी 
अपना मानने की ताकत 
रचती है संसार 

तुम भी रचे जाते हो इससे 
और
अपने आपको 
रच रच बनाते
मगन हो जाते इस निर्माण कला में
भूल भी जाते हो कई बार
कि 
तुम अपने निर्माता स्वयं हो

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
१९ फरवरी २०१० 
शुक्रवार, सुबह ६ बज कर ३७ मिनट

Thursday, February 18, 2010

112- एक अद्रश्य चुनौती

                                                 (छायाकार - अशोक व्यास )
अब अच्छा लगता है
चुनौतियों को बुलाना
उनके साथ खेल रचाना
कभी जीत जाना 
कभी हार जाना

चुनौती बाहरी लगती हैं जो
होती तो हैं भीतर की ही हमेशा

हर चुनौती के साथ
कुछ और खुलता है
कुछ और मिलता है
अपने अन्दर

अगर देखा जाए तो
एक अद्रश्य चुनौती है ये
कि किसी भी चुनौती के स्वागत में
हम अपने से बाहर उतनी दूर ना जाएँ
कि फिर अपने तक लौट ही ना पायें

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका 
फरवरी १८, २०१० 
सुबह ७ बज कर १६ मिनट

Wednesday, February 17, 2010

यह पंक्तियाँ हमारी मुक्ति का उत्सव हैं


सृष्टि के प्रारम्भ में
क्या सचमुच 
नाद ही था

एक स्पंदन
जिससे होता गया फैलाव

कामना के स्पंदनों का
फैलाव देखते
कभी कभी होता है विस्मय
 २ 
सूर्य किरण उतर कर
सहलाती है जब
धरती को
मेरे भाल पर भी
करती है
उजियारे का तिलक

दीवारों के बीच
सुबह से शाम तक
जगमग स्क्रीन के सामने
ना जाने कब 
पोंछ कर शुद्ध उजियारा
भूल ही जाता हूँ
अपने उजियारे और विस्तार से सम्बन्ध को


निशा में भी करुना है
लेकर अपनी गोद में
पुचकार कर
देना चाहती है
उजियारे के साथ
खेलने की पात्रता


सुबह शाम रात
खेल है जो
कामना के स्पंदनो का

खेल यह मेरा है
या मुझसे खेलने वाला 
खिलाडी है कोई और

सुबह सुबह 
खेलता हूँ 
इस प्रश्न से
मैं खेल हूँ या खिलाड़ी


सहसा कौंध जाता है
बोध सा 
साँसों में बैठा 
कहता है कोई
'जब सतर्कता नहीं है
तुम खेल बन जाते हो
जब सतर्कता है
तुम ही खिलाडी हो'


सरल लगता है यूँ तो
रहस्य सारा
सतर्कता में छुपा है 
साधना का मतलब 
उजियारे के तिलक 
का स्पर्श
दीवारों के बीच
भी जाग्रत रखना है
स्मृति में

तो इस तरह
जो स्मृति सफलता का सूत्र है
पंख है, उड़ान है,
विस्तार है

उसी स्मृति को
सौंप कर अपना आप
लो मुक्त हुआ 
मैं इस क्षण
तुम्हारे साथ

यह पंक्तियाँ
हमारी 
मुक्ति का उत्सव हैं

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
सुबह ९ बज कर १३ मिनट
बुधवार, १७ फरवरी २०१०

Tuesday, February 16, 2010

110- बाहर भीतर का भेद

बाहर जाऊं या भीतर
अभिव्यक्ति की पगडंडी पर
उठा कर अपने लिए यह सवाल 
बैठ जाता हूँ
दो राहे पर

२ 

क्या साथ साथ नहीं हो सकती
दोनों गतियाँ 
बाहर भी जाऊं
भीतर की गहरायी भी अपनाऊँ

पूछते पूछते
अनायास ही
हो गया प्रवेश
भीतर
३ 
अपने भीतर क्या जगह है
कितनी जगह है
क्यों जाना होता है
और इस आने जाने में
इंसान क्या पाता है
क्या खोता है


भीतर से बाहर ले जाने को
आतुर एक 'वृत्ति' ने
सरलता से
समझाते हुए कहा मुझे
'देखो
बाहर जितना भी खेलो
जितना भी खाओ
जितना भी कमाओ
जितना भी पाओ 
विश्राम तो घर पर ही होता है ना
ऐसे ही 
तुम्हारे भीतर तुम्हारा वो घर है
जहाँ शांति है, आराम है
और ऊर्जान्वित  होने का अद्भुत सामान है
इस ऊर्जा को लेकर बाहर जाओ
सुन्दरता बढाओ, श्रद्धा बढाओ, प्यार बढाओ
भीतर आ गए 
अच्छा है 
पर यहाँ बैठे ना रह जाओ

५ 

बाहर और भीतर मिल कर
ही
जीवन की सम्पूर्णता का अनुभव देते हैं 
 बाहर के सृजन
और भीतर के मनन में
पारस्परिक संवाद की
एक निरंतरता है

इस निरंतर लय में 
ऐसे रम जाओ
कि एक सूक्ष्म क्षण में
बाहर भीतर का भेद
भूल जाओ


अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका 
१६ फरवरी १० 
सुबह ८ बज कर ७ मिनट 

Monday, February 15, 2010

किसके लिए जल रहे हो?


बात बनाने के लिए
कितनी बार मिटाते हैं बात
हम क्यों भूल जाते हैं
सुन्दर लय का साथ

कभी कभी घिर कर अधीरता में
भुला बैठते हैं
जो कुछ भी 
पाई है सौगात

एकाकीपन बाहर से नहीं 
भीतर से आता है
तब, जब आश्वस्ति का भाव
कहीं खो जाता है

हम जलते हुए सवालों के सामने
निर्वस्त्र होकर
खड़े हो जाते हैं अकेले
यूँ मान कर कि
जलने के अलावा और कोई विकल्प है ही नहीं
2
तप कर तो हम निखरते हैं
पर जल कर तो हम बिखरते हैं

तपने और जलने का अंतर
जो बताते हैं
हमारी भाषा में वो गुरु
कहलाते हैं
किसके लिए जल रहे हो?
गुरु जब ये सवाल उठाते हैं
तो उसके साथ
नयी दृष्टि लेकर आते हैं

कौन हो तुम?
गुरु जब ये सवाल उठाते हैं
तो हम स्वयं तक
नए रास्ते से पहुँच पाते हैं

सफलता और असफलता के बीच
आशा और निराशा के बीच
जो घाटी है
उसे गुरु
अपनी वात्सल्यमयी दृष्टी से
सहज ही पार करवाते हैं

आश्वस्ति के दो घूँट पीकर 
हम फिर श्रद्धा से जगमगाते हैं
पर समझ नहीं पाते हैं
कि क्यों कभी कभी हम
गुरु को भूलते हैं
और यंत्रवत होकर
यंत्रणा के समीप पहुँच जाते हैं

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
सोमवार, १५ फरवरी १० सुबह ८ बज कर १९ मिनट

Sunday, February 14, 2010

108- जैसे देखते हैं दर्पण में चेहरा अपना

जैसे देखते हैं दर्पण में चेहरा अपना
ऐसे ही
शब्दों की चमक में
मन की उपरी सतह पर
झिलमिला कर आयी हुई
अनुभूतियों को
देख देख
सहेजता हूँ ऐसे
जैसे कोई संभल कर रखे 
सीप में से मोटी


निर्धारित समय के बीच से
बहते हुए
बिना किसी तनाव के
अपनी मस्ती को बनाए रखते हुए
गंतव्य की तरफ बढ़ना
सीखना चाहिए नदी से

नदी के गीत सुनने
दूर कहाँ जाएँ

चलो कुछ देर बैठ कर
मौन में
सुन लें
सांस नदी का गुंजन


बात ये है की
रोम रोम में से फूट रही है
ज्ञान के आलोक की रश्मियाँ
जैसे हर कोशिका में समाया
है सार जीवन का

पर चुस्त हुए बिना
पहाड़ की पगडंडी पर ही
हाँफ जाते हैं
चोटी तक पहुँच 
नहीं पाते हैं

और तत्पर हुए बिना
रोम रोम में रमते अनंत का
सूक्ष्म स्वर
सुन नहीं पाते हैं

हम सब बड़े मजाकी हैं 
शोर मचा कर
शांति को बुलाते हैं

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
रविवार, फरवरी १४, १० सुबह ८ बज कर ०७ मिनट

Saturday, February 13, 2010

107 - सब जगह होते हुए भी


तो क्या बात है
जो बहस के बीच
खींच देती है
एक ऐसी रेखा
कि आप या तो इस तरफ हो
या उस तरफ
 २
रेखा के खिंच जाने के बाद 
जब हमारे अन्दर 
रेखा के निर्धारित स्थल को लेकर
होता है प्रश्न

जो हमें 
किसी भी पक्ष को
पूरी तरह से स्वीकारने से रोकता है

तब हम ना इधर के होते हैं
ना उधर के

हम हर बार
रेखाओं के खिंच जाने के बाद ही
क्यों जागते हैं?

और जब संसार कथित रूप से
बंट गया होता है
दो हिस्सों में

हम ना इधर के
ना उधर के

Friday, February 12, 2010

105 veen kavita- अपना सम्पूर्ण वैभव

और कई बातें
चली आती हैं
खींचती हैं ध्यान
बंटवारा अपना हर दिन करते हैं हम
खंड खंड दिन में
बने रहते हैं अखंड
पर
कभी कभी
खिंचाव के क्षणों में
जब तिरोहित हो जाती
अपनी सम्पूर्ण पहचान

कातर होकर
पुकारते हैं
उसे
जिससे मिली है पहचान 
और जिसकी दृष्टी से 
फिर उजागर हो जाता 
अपना सम्पूर्ण वैभव 


अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका 
सुबह ७ बज कर ५८ मिनट पर

Thursday, February 11, 2010

विराट के चरणों में


उल्लास और स्फूर्ति के नए आभूषण
बनाओ सांसो से
पहनाओ सांसो को

झिलमिलाने दो इस चमक को
अपनी मुस्कान में

उन्ड़ेलो शुभ्र भाव का रस
अपने शब्दों में

मौन में
जब उतरता है
अनुभव माधुर्य का
तुम्हारे लिए
तुम्हारे भीतर से

करो सत्कार इसका
चढ़ा कर 
कृतज्ञता के
नव सुमन
विराट के चरणों में


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
फरवरी ११, १०
सुबह ८ बज कर ५३ मिनट

Wednesday, February 10, 2010

104 वीं कविता/ अपना कर शीतल व्यवहार




बर्फ उतरती है कैसे 
इतनी सारी
कहाँ होती है
ये तैय्यारी


शाखाओं पर बिछी बर्फ
ज्यादा सुन्दर है
या मकान की छत वाली,
या फिर ये जिससे
सफ़ेद हो गयी गाड़ियां काली

३ 
सौंदर्य और सुरक्षा,
हम इन दोनों के लिए
कई बार अपनी शांति गँवा बैठते हैं
क्या बर्फ के साथ 
उतरता है
शांति का सन्देश कोई

४ 

नए सिरे से उतर कर
बर्फ
दिलाती है याद
सृष्टा अब भी खेल दिखाना चाहता है
अब भी
उसे चाहिए कि हम
नए सिरे से सीखें
कैसे रखें अपना ध्यान

हर चुनौती के पार
अपना कर शीतल व्यवहार
अक्रूर बन कर 
सब तक पहुंचाए प्यार का उपहार




अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
१० फरवरी १०
८ बज कर ४२ मिनट

Tuesday, February 9, 2010

103- समझ तो बदलती जाती है


द्वार खोल कर
देख लिया यूँ ही
फिर एक बार
वैसे इंतज़ार तो नहीं था किसी का


अब यूँ हो गया है
धीरे धीरे
जो भी आता है
लगता है
मैं ही लौट आया हूँ
अपने पास
नया रूप लेकर


अब सहेजने का मोह भी नहीं रहा
जो है जैसा है
भला लगता है
इसका ज्यों का त्यों बने रहना,

और सत्कार का भाव है
बदलाव के प्रति भी 

बिना आग्रह ना जाने कैसे
वह सब होने लगा है
जिसका आग्रह रहा था कभी


एक दिन मैंने
गाँव के पहाड़ की
सबसे ऊपर वाली चोटी पर चढ़ 
दोनों बाहें उठा कर
कहा था उससे
ले लो गोदी में मुझे

शायद तब से 
वो गोदी में लिए लिए
सब कुछ करवा रहा है मुझसे

जब जब गोदी से उतरने की जिद करता हूँ
किसी को चोट पहुंचा बैठता हूँ
या फिर कोई ओर
चोट पहुंचा देता है मुझे

हाँ
इतनी ही समझ है

नासमझ हूँ
और नासमझी में
संसार के बदलते चेहरों को देख कर भी
बदलता नहीं मैं
समझ तो बदलती जाती है

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
९ फरवरी १० 
सुबह ६ बज कर ५१ मिनट पर

Monday, February 8, 2010

१०२ वीं कविता, जिंदा होने का अर्थ


                                          (photo by - Shruti vyas)

कभी कभी यूँ होता है
हम अपने हिस्से की ज़मीन छोड़ देते हैं
शायद इसलिए की हममें
उतना विश्वास नहीं होता
कि हम
धरती को पैदावार के लिए
राजी करने जितना पसीना
कुशलता से बहा पायेंगे




कभी कभी
हम अपने अधिकार इसलिए छोड़ देते हैं
क्योंकि संकोच होता है
दावा करने में

हम नहीं कर पाते फर्क
अच्छा दिखने
और अच्छा होने में



कभी कभी
अपना पक्ष प्रस्तुत करने से पहले ही
हमें लगता है
फैसला होने ही वाला है
हमारे खिलाफ

और
हम ये बताने में भी
संकोच कर जाते हैं
कि लड़ाई में
हमारा अंदरुनी समर्थन
किस ओर था



इस तरह
कभी कभी
हम अपने संकोच
और अपने अविश्वास में
खुद को ये बताना भी
भूल जाते हैं
कि हम जिन्दा हैं

क्योंकी हम जान कर भी
नहीं मानते ये बात कि
जिंदा होने का अर्थ
सिर्फ सांस लेना नहीं है


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
सुबह ८ बज कर १४ मिनट
८ फरवरी २०१०

Sunday, February 7, 2010

१०१ वीं कविता / अभी तुम्हे बहुत कुछ पाना है







छुपा कर अपना उत्साह
संयत होने का प्रयास करता
आज बताने लगा
परम पिता को
'सीख लिया है मैंने
समन्वय की किरणों को बुलाना
देखा है
आनंदित आभा का उतर कर आना
लगता है
देह को लेकर देह से परे पहुँच कर
होता है
प्यार में डूबना, मगन हो जाना'



परम पिता कुछ ना बोले
मैं शरमाया
मुझसे कुछ भूल तो नहीं हो गयी
पूछा तो
वो कुछ बोले नहीं

पर माता जगदम्बा ने कहा
'तुम अभी पहली सीढ़ी तक आये हो
वो भी
तुम्हारे पिता की
करुणामय कृपा के बाद,

अभी तुम्हे बहुत कुछ पाना है

जब अपने पिता के
असीम वैभव को पहचान जाओगे
तब अपनी उपलब्धियां बताने के स्थान पर
बस उनकी महिमा का गुण गाओगे'


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
सुबह ७ बज कर ५० मिनट
फरवरी ७, १०

Saturday, February 6, 2010

तुम ही आनंद हो


कितनी तरह के आनंद हैं
उपलब्ध हमारे लिए
करते हैं
प्रतीक्षा हमारी
आओ
अपना लो हमें

एक आनंद वो
जो सांस लेने का है
हम पहचानते ही नहीं इसे

एक वो
जो बनता है सूत्र
हमारे एक चरण से दूसरे चरण के बीच
देना चाहता है
ताजगी और उल्लास का उपहार

पर चाहता है
हम खोलें वो द्वार
जिनके भीतर बंद होकर
हम कर नहीं पाते
स्वशासन

आनंद ने सरल से नियम बना रखे हैं
विजेता घोषित करने के लिए

लो देखो अपने आप को
स्वीकार करो
ऐसे
कि तन और मन के खेल में
नियंत्रण बना रहे तुम्हारा

संतुलित होकर
बढाओ सामर्थ्य, सक्षमता
बहने दो शक्तियुक्त रसमयता

किनारों के बीच बहती है
नदी जैसे
नियमों के बीच बहो
ऐसे के स्मृति में रहे
सम्बन्ध सागर से

आनंद उमड़ कर
स्नान करवाता है जब तुम्हे
अपने आप का अभिषेक करते हुए
इस स्वतः स्फूर्त आलोक से

लो
किसी एक क्षण में
हो जायेगी अनुभूति
तुम ही आनंद हो


अशोक व्यास
फरवरी ६, १०
न्यूयार्क, अमेरिका
सुबह ८ बज कर ९ मिनट

Thursday, February 4, 2010

शुद्ध प्रेम का उपहार



लक्ष्य क्या है

लक्ष्य की पहचान करते करते
जब कर रहा होता हूं अपनी पहचान
अपने भीतर छुपे हुए
खजाने की तरफ जाता है ध्यान

सहसा
विस्तार का द्वार खुल जाता है
सहसा असीम समंदर गरज जाता है

लक्ष्य मेरा
और कुछ नहीं
इस अनंत वैभव वाली पहचान को
नित्य जगाना है
सृजनात्मक रस से सब तक
शुद्ध प्रेम का उपहार
पहुंचाना है


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
सुबह ७ बज कर २८ मिनट
फरवरी ४, २०१०

Wednesday, February 3, 2010

क्यों हम अपने आपको नकारते हैं



कभी कभी हम नया कदम उठाने से पहले
अपेक्षाओं के बोझ से दब जाते हैं
कभी कभी हम प्रतिक्रिया पर इतना ध्यान लगाते हैं
कि अपने मूल को भूल जाते हैं

क्यों हम अपने आपको नकारते हैं
क्यों पराई दृष्टी इस तरह स्वीकारते हैं
कि अपने कबूतर को भुला कर
दूसरों की बिल्ली को पुचकारते हैं


प्यार बाहर तब ही जाएगा
जब अपने भीतर पनप पायेगा
आत्म सौन्दर्य को देखे बिना
जो प्यार सा लगेगा, मुरझा जाएगा



अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
३ फरवरी २०१०
सुबह ८ बज कर १ मिनट

आनंदित निर्झर

छम छम बरसे प्रेमामृत सा खिला करूण अलोक अपरिमित मौन मधुर झीना झीना सा सरस सूक्ष्म  आनंदित निर्झर तन्मय बेसुध  लीन....  ...