Saturday, February 6, 2010

तुम ही आनंद हो


कितनी तरह के आनंद हैं
उपलब्ध हमारे लिए
करते हैं
प्रतीक्षा हमारी
आओ
अपना लो हमें

एक आनंद वो
जो सांस लेने का है
हम पहचानते ही नहीं इसे

एक वो
जो बनता है सूत्र
हमारे एक चरण से दूसरे चरण के बीच
देना चाहता है
ताजगी और उल्लास का उपहार

पर चाहता है
हम खोलें वो द्वार
जिनके भीतर बंद होकर
हम कर नहीं पाते
स्वशासन

आनंद ने सरल से नियम बना रखे हैं
विजेता घोषित करने के लिए

लो देखो अपने आप को
स्वीकार करो
ऐसे
कि तन और मन के खेल में
नियंत्रण बना रहे तुम्हारा

संतुलित होकर
बढाओ सामर्थ्य, सक्षमता
बहने दो शक्तियुक्त रसमयता

किनारों के बीच बहती है
नदी जैसे
नियमों के बीच बहो
ऐसे के स्मृति में रहे
सम्बन्ध सागर से

आनंद उमड़ कर
स्नान करवाता है जब तुम्हे
अपने आप का अभिषेक करते हुए
इस स्वतः स्फूर्त आलोक से

लो
किसी एक क्षण में
हो जायेगी अनुभूति
तुम ही आनंद हो


अशोक व्यास
फरवरी ६, १०
न्यूयार्क, अमेरिका
सुबह ८ बज कर ९ मिनट

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