Sunday, February 7, 2010

१०१ वीं कविता / अभी तुम्हे बहुत कुछ पाना है







छुपा कर अपना उत्साह
संयत होने का प्रयास करता
आज बताने लगा
परम पिता को
'सीख लिया है मैंने
समन्वय की किरणों को बुलाना
देखा है
आनंदित आभा का उतर कर आना
लगता है
देह को लेकर देह से परे पहुँच कर
होता है
प्यार में डूबना, मगन हो जाना'



परम पिता कुछ ना बोले
मैं शरमाया
मुझसे कुछ भूल तो नहीं हो गयी
पूछा तो
वो कुछ बोले नहीं

पर माता जगदम्बा ने कहा
'तुम अभी पहली सीढ़ी तक आये हो
वो भी
तुम्हारे पिता की
करुणामय कृपा के बाद,

अभी तुम्हे बहुत कुछ पाना है

जब अपने पिता के
असीम वैभव को पहचान जाओगे
तब अपनी उपलब्धियां बताने के स्थान पर
बस उनकी महिमा का गुण गाओगे'


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
सुबह ७ बज कर ५० मिनट
फरवरी ७, १०

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