Sunday, February 28, 2010

122 - होली खो जाने को उकसाती है

(द्वारकाधीश मंदिर, न्यू जर्सी, होली २००९, चित्र - रुनझुन अग्रवाल)
१ 

अब जब पहले से भी ज्यादा जरूरी है
आत्मीय स्पर्श का जीवित रहना
और
भावनाओं के मरुस्थल में
रंग रस की मस्ती का बहना

अब दूर रह कर रंगों से
हम जीवन को जान ही नहीं पायेंगे
ठीक है टी वी, इन्टरनेट
पर धडकनों की संगत कैसे पायेंगे

कब तक उधार के सुख दुःख से
अपना सारा काम चलाएंगे
कब खुद अपनी अनुभूतियों से
अपना जीवन थाल सजायेंगे

होली का बुलावा सुन कर भी
क्या बंद कमरों में ठहर जायेंगे
बाहर निकल कर, टोली बनाना जरूरी है
तभी तो हम खुद बन पायेंगे


बनने और बनाने के लिए
ये भी जरूरी है
की बने बनाए पर ही ना इतरायें,
उत्साह का रंग लेकर
कुछ नया सपना देखें 
कोई नया पुल बनाएं,

होली खो जाने को उकसाती है
संकोच से बाहर लाती है
मेल जोल के सौंदर्य का
अनूठा स्वाद चखाती है

 'होली है' कहते हुए जब
किसी के गालों को हमारी
हथेली छू जाती है
उसमें भी आत्मीय तरंग 
की विद्युत सनसनाती है

लो, भर लो अपनी बाँहों में
उल्लास और विस्तार,
गौरवशाली परम्परा जीती है तुममें
और तुमसे जीवन पाती है 

होली की बधाईयों में
जिन जिन की स्मृति आती है या नहीं भी आती है
ये कविता उन सबके नाम
रंग भरी शुभकामनाओं की एक मधुर पाती (चिट्ठी) है


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
रविवार, २८ फरवरी १०
सुबह ८ बज कर ३० मिनट पर




No comments:

कविता

कविता न नारा न विज्ञापन कविता सत्य खोजता मेरा मन कविता न दर्शन न प्रदर्शन कविता अनंत से खेलता बचपन कव...