Thursday, March 31, 2011

हर धड़कन में प्यार जगाएं


चल जीवन का रस भर लायें
सुन्दरतम को गले लगाएं
जिससे सब अपना हो जाए
चलो, आज उसको अपनाएँ

निर्णय कर लेने का क्षण है
बंधन छोड़, मुक्त हो जाएँ
अपने होने की आभा को
करें उजागर, अब न छुपायें

जीवन हर दिन नया नया है
नूतनता को सखी बनाएं
जो दीखता है, उससे आगे
अनदेखे से आँख मिलाएं

वो जो फूल फूल खिलता है
उसे अधर पर आज बिठाएं
करें असंभव को अब संभव
हर धड़कन में प्यार जगाएं

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
३१ मार्च २०११   
      
 


    

Wednesday, March 30, 2011

बैठ कर शिखर पर


यह जो
शुद्ध, सौम्य आलोक प्रवाह
उछल उछल कर
हो रहा है
प्रवाहित
अनवरत
इसकी एकरसता में भी
कितनी विविधता है
इसकी एक तान में
उद्घाटित है
कितना सौन्दर्य

बैठ कर
शिखर पर
देखता हूँ
किरण उज्जवल
नहीं बिटिया सी
खेलती है
मेरी गोद में
और
चूम कर मेरा भाल
नहला देती है मुझे
अमृतघट उंडेल कर 
जैसे कभी
गंगा ने छू लिया था
भागीरथ के पूर्वजों को


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
बुधवार, ३० मार्च २०११   

              

Tuesday, March 29, 2011

होता तो है अपने आप


वहां न छोडो बात
जहाँ से झांकता रहे अधूरापन
वहां तक रहे साथ
जहाँ निखरता है नित्य अपनापन

 
पत्तों के नए वस्त्रो का आर्डर देकर
धूप सखी से बतियाती
  जड़ से जुडी हुयी 
नंगी शाखाएं भी मुस्कुराती 
 
 
डुबकी लगा कर
मैंने गंगा में
जब अपने दादा को याद किया था
तब एक सिरहन सी जागी थी बदन में
जैसे पावन गंगा ने
मेरा प्रणाम देह से परे हुए दादा तक
पहुंचा कर
मुझे दे दिया एक संकेत
'हाँ
तुम करो पाठ 'गीता' का
सूक्ष्म श्रवण दादा-दादी का 
साथ है तुम्हारे'
 
 
यह सब 
जो होता है
हमारे करने से होता लगते हुए भी
होता तो है अपने आप
 
इस अपने आप होते हुए को
देखते हुए
किसी एक निश्छल क्षण में
हो लेता हूँ 
मैं भी
ना होते हुए

और इस 'हुए'
से झरता है
आलोकित आनंद
 
उमड़ आता 
साँसों में
ताज़े मक्खन सा प्रेम
 
जिसे चुपचाप लुटाने
घर-घर जाता हूँ

अचरज है
जितना जितना लुटाता हूँ
उससे कहीं अधिक
अपने भीतर पाता हूँ
इस स्वतः स्फूर्त खेल में
जितना जितना खो जाता हूँ
उतना उतना स्वयं को पाता हूँ


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
मंगलवार, २९ मार्च 2011 



  
  

Monday, March 28, 2011

जीना स्थगित करते जाते हैं



कोई धैर्य से
ढूंढ ढूंढ कर
निकाल सकता है
मोती,
कोई सजगता से
तेज हवाओं में
बचा सकता है
अंतर्ज्योति
हम जो चाहते हैं
वो पाते हैं
चाहने की लय से
जीवन सजाते हैं
पर ये हो जाता है अक्सर
हम चाहते क्या हैं
ये समझ नहीं पाते हैं

इधर-उधर समय बिताते हैं 
जीना स्थगित करते जाते हैं 
आ पहुँचती है अंतिम सांस अचानक
और हम जीना शुरू भी नहीं कर पाते हैं

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
२८ मार्च २०११   

2

जब तक नहीं हो पायेगी अपनी पहचान
तब तक  अधूरापन रहेगा विद्यमान
देखना ही होगा, वह 'एक' जिससे जीवन है
जिसके होने से, हर मनुष्य है ही महान

यूँ तो देखना हमारा नित्य गतिमान है
पर इसके बीच ठहराव का एक स्थान है
धरा के हर एक हिस्से पर, हर क्रिया में
करना हमें, उस स्थल का अनुसन्धान है   


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
२९ मार्च २०११  

 

 

Sunday, March 27, 2011

शाश्वत स्पंदन




सोच कर नहीं
पर बिना सोचे भी नहीं
सोच कर न सोचने के बीच 
एक जो
सुन्दर विराम होता है विस्तार का
एक जो अचंचल चंचलता होती है पंखों में
उस संधि काल में
जब अँधेरा और उजाला एक दूसरे पर
भरोसा कर
विश्राम के लिए प्रस्थान करते हैं

उस मिलन के महीन क्षण में
न जाने कहाँ से आकर
वो रख देता है
मेरी हथेली में
एक 
शाश्वत स्पंदन

ये एक मर्मयुक्त क्षण
सार युक्त बना देता है
सारा जीवन


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
रविव्वर, २७ मार्च २०११   

      

Saturday, March 26, 2011

दुर्लभ अनुभव


तुम्हारी दी हुई 
 पूंजी के प्रकाश का असर
मेरा पथ समाप्त होने से परे तक जाता है
 शुद्ध हुए बिना
इस विस्मयकारी प्रकाश को
अपना लेना, संभव नहीं हो पाता है  


यह सूक्ष्म, संवेदनात्मक ज्ञान
पूरी तरह आत्मसात 
नहीं कर पाया,
कभी इस बात को लेकर
व्याकुलता से
छटपटाया, 
पर आज 
ये सोच कर
अपने सौभाग्य पर इठलाया,
की मैंने
तुम्हारी कृपा से
सत्य को छू लेने का
दुर्लभ अनुभव तो पाया
  
अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
२६ मार्च २०११  
 

Friday, March 25, 2011

तुम्हारी मुस्कान के अनंत खेल





हो तो ये भी सकता था शायद
की मैं देखते ही पहचान लेता तुम्हें
तुम्हारे स्पर्श से ही समझ लेता
वह सब
जो अब तक नहीं समझा हूँ

पर अब 
जितना जितना देखा
जितना जितना जाना
जितना जितना समझा है तुम्हें
मुझे नित्य उल्लास से भरता है

तुम्हारे प्रवाह का अंश
पर तुमसे अपरिचित
कैसे संभव हो रहा इतने बरस

शायद फिर किसी लहर की उछल
ले जा सकती है
यह स्वर्णिम स्मृति
जो मुझ पर
तुम्हारा परिचय खोलती है

मुस्कुरा कर देखता हूँ
तुम्हारी मुस्कान के अनंत खेल

और 
हँसते हँसते
अपने में ही मगन हो जाता हूँ

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
२५ मार्च 2011           

Thursday, March 24, 2011

पूर्णता देखने वाली आँख






ठण्ड, चाय, बिस्किट
सुबह के पहले वाला अँधेरा
लो कुछ देर में 
शुरू हो जाएगा 'तेरा-मेरा'


यात्रा पहुँचने के लिए
और पहुँच कर भी जारी यात्रा
स्मृति की पटरी पर
चेतना टटोलती है
उस स्टेशन का स्पर्श
जहाँ से
शुरू हुयी थी यात्रा


        ३

अधूरे सपने हैं या आँख?
सवाल पूछ कर
सर्वनियन्ता ने
दे ही दी मुझे
पूर्णता देखने वाली आँख

पलक झपकते ही
दिशा बदल कर
दशा बदलना जानता है
हर दिशा का रूप लेकर
लुका-छुप्पी खेलने वाला
वह
एक 


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
गुरुवार, २४ मार्च २०११         

Wednesday, March 23, 2011

हंस बना मैं चुगता हूँ


याद तुम्हारी
मोती जैसी
हंस बना मैं चुगता हूँ
गति तुम्हारे
साथ निरंतर
साथ तुम्हारे रुकता हूँ

लुप्त हुआ 
सारा कोलाहल,
मिटा दिया
तुमने मन का छल,
ओ  ज्योतिर्मय
सूक्ष्म कलायुत 
ओ अनंत
तुम अद्भुत संबल 


रिमझिम बूंदों में
तुम आये
सूर्यकिरण बन कर
मुस्काये
पवन तुम्हारी
आश्रित अच्युत
पत्ती पत्ती
तुमको गाये


संवेदन तुम
मन वसंत तुम
धारा तुम
और आदि-अंत तुम

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
बुधवार, २३ मार्च 2011  

 
   
      
     

Tuesday, March 22, 2011

दो सिक्के


 
उसने दो सिक्के
देकर मेरे हाथ में
मुस्कुरा कर दे दिया आश्वासन
सारी दुनिया खरीद सकते हो इनसे तुम


उसी पेड़ के नीचे
बैठे बैठे
न जाने कैसे
एक क्षण में
हर लिया किसीने 
मेरा सब दारिद्र्य

दिखने को तो
नहीं दिखी कोइ दौलत
पर
समृद्धि का स्रोत बन
आनंद कोष लुटाने को
तत्पर था मैं
संसार के सबसे बड़े सम्राट की तरह

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
२१ मार्च २०११   
           

Monday, March 21, 2011

शाश्वत का जादू




बदलता नहीं है रास्ता
वही भाव
वही शांति
वही अधीरता
स्वीकारने के सुख के
साथ साथ
अस्वीकृति का तानपूरा

बदलता नहीं हूँ मैं
वही स्वाद
वही चोट
वही तुतलाहट
वही उठ कर चलने 
और क्षितिज से हाथ मिलाने की ललक

वही रास्ता, वही मैं
पर धीरे धीरे
ना जाने किस अनदेखे क्षण में
बदला है 
रास्ते से मेरा सम्बन्ध


और अब
विराट की मुस्कान
मुझसे खेलते हुए
मुझे दिखाने भी
लगी है
खेल की बारीकियां

सब कुछ सरल होते हुए भी
कितना मुश्किल है

जानते हुए भी
अस्वीकार कर खुदको
 बढ़ा देते हैं हम
ऊंचाई सीढ़ियों की 

और फिर
समझ के नए स्वर
जब फिर से  छोटा करते हैं
सीढ़ियों को

वही पुराना गीत गाते हुए
आगे बढ़ते
हम ये सोचते हैं
कि अभी-अभी बना है ये गीत

रास्ते और मेरे बीच का 
बदलता हुआ सम्बन्ध
पुराने को इस तरह नया करता है
की रास्ता नया लगता है
मैं भी नया नया लगता हूँ खुदको

तो शायद
शाश्वत का जादू
खिलता है
सम्बन्ध के द्वारा ही
और 
जुड़े बिना शायद
खुल ही नहीं सकता विस्तार हमारा

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
सोमवार, २१ मार्च २०११   


                 

Sunday, March 20, 2011

आनंद रसधार


श्वेत शिखर
निर्मल विस्तार
जैसे मुस्कुराता
सीमारहित प्यार


छूट गए
स्वतः विकार
मिलन 
मन के उस पार


न रुकना
न चलना
पर उससे
चलता संसार


मेरा मौन 
छू लिया उसने
बहे है
  आनंद रसधार

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
रविवार, २० मार्च २०११   

                

Saturday, March 19, 2011

सजगता की महिमा


आधी उम्र बीतने के बाद
एक दिन
खोल कर देखी वो चिट्ठी
जो आई थी 
सांसों के साथ

जिसमें लिखा था
तुम्हारा जीवन
मिल जुल कर बनायेंगे
'मैं और तुम'

मिलता रहूँगा
धरती-गगन के रूप में
जल और पवन के रूप में
काल सखा भी मैं और
   मिलूंगा अगन के रूप में     

चिट्ठी पढ़ कर ये जान पाया
उसने तो अपना  वचन निभाया 
पग पग पर मेरे साथ आया
बस मैं ही
 सजगता की महिमा समझ पाया
मैंने अपना कर्त्तव्य नहीं निभाया
बस यही देखता रहा, क्या खोया, क्या पाया
                                                      सब कुछ देखा पर  स्वयं को ना देख पाया



अब प्रसन्नता की एक नयी झांकी है
स्वर्णिम है हर क्षण, जो जो बाकी है
 स्व के संगीत को सुनने में सजग 
नित्य मुखर सुन्दरता  आत्मा की है   

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
शनिवार, १९ मार्च २०११  
         

Friday, March 18, 2011

सूक्ष्म कला


एक सधी हुई अधीरता सी है
या उत्साह है छलछलाता हुआ
बैठ कर 
दिन के इस किनारे
आतुर हूँ
सौंप देने
नया प्रेम गीत
समय की धडकनों को
कर्म रूप में ढाल कर

अपने समाधिस्थ मौन से
निकल कर
खिलता हुआ भास्कर
जुड़ कर मानस से
सिखा रहा है
कुछ न करते हुए
सब कुछ कर पाने की
सूक्ष्म कला


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
शुक्रवार, १८ मार्च २०११              

Thursday, March 17, 2011

आग्रहों के अतिक्रमण को हटा कर



मौन ही हो आस पास
हमेशा
ना आवश्यक है
ना संभव

मौन अपने भीतर
मधुर रस के साथ
बनाए रखने का अभ्यास
करते हुए
सिखाता है कोइ
बंधन रहित जुड़ाव
और
जुड़ाव रहित बंधन 

 
धैर्य के साथ
श्रद्धा के स्वर्णिम आलोक में
हीरे को तराशने वाले कारीगर की तरह
देख कर
खट्टे-मीठे अनुभव
एक काँटा यहाँ हटाता हूँ
एक चुभन वहां मिटाता हूँ
अनंत के स्मरण से
क्षमाशीलता की सौरभ पाता हूँ  
आग्रहों के अतिक्रमण को हटा कर
फिर से नया हो जाता हूँ  


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
गुरुवार, १७ मार्च 2011 
                

Wednesday, March 16, 2011

आनंद की उछाल


वह जो दिखता है
उसके पीछे वह है
जो दिखता नहीं
पर है

एक वह
जो है
जो रचता है
रचता है स्वयं से
स्वयं को
और
खेलता है खेल 
खोने और पाने का


एक वह
अपने आनंद की उछाल 
प्रकट करता है
छुप छुप कर

जो दीखता है
उससे परे
अद्रश्य को देख कर
संचरित होता है जो आनंद मुझमें
उसे मैं गाता हूँ
या वो ही
मेरे अलग अलग कर्मों से मुझे गाता है
       लौकिक-अलौकिक का भेद मिटाता है          


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
१६ मार्च २०११  

Tuesday, March 15, 2011

अवश्य उतरेगी भोर


कई पीढियां 
करती रहीं आतंरिक अनुसन्धान
फिर जाकर
समझ आयी मानवता की शान
जान पाए
समस्या में ही निहित होता है समाधान
और जो आधार है साँसों का
वो साँसों में ही रहता है विद्यमान

अब बस इतना है
की साँसों के आवागमन पर देना है ध्यान
और उनके संधि स्थल से
सुन लेना है शाश्वत का मधुर आव्हान

 साथ हो चाहे हमारे 
 इच्छाओं का कोलाहल या अनिश्चय का शोर
सूरज का आश्वासन है
घने अँधेरे को समेटने, अवश्य उतरेगी भोर



अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
मंगलवार, १५ मार्च २०११   

         

Monday, March 14, 2011

धारा की छेड़-खानी


विनाश का चेहरा भी
कितने रूप और प्रभाव लिए होता है
किसी का मिटता है संसार
किसी का मनोरंजन होता है

और फिर 
ठहर गयी मानस में 
धारा की छेड़-खानी 
मिटते हुए चित्रों में
छुपी अमिट कहानी
सुन्न हो गया मन
मंद हो गयी रवानी
प्यास नहीं प्यासों को 
लील गया पानी



अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
१४ मार्च २०११ 
शाम सभा  
  
 

हर रंग में


1
सात रंग तब दीखते हैं
जब प्रिज्म से होकर आते हैं
हम सब अद्भुत प्रिज्म हैं
एक रंग के कई कई रंग बनाते हैं


केंद्र एक
विस्तार को जन्म देकर
चरों तरफ 
प्प्रकषित कर लालिमा
इस तरह उजियारे की धारा बहाता है
की चमकती लहरों के खेल में भी
केन्द्रीय स्थल का स्मरण खो जाता है 


पहले लाल
फिर पीला
फिर लाल और पीले का मिश्रण
उसने मेरी दृष्टि को
तरह तरह के परिधान पहनाये
और फिर
सब कुछ समेट कर
दे दिया मुझे आमंत्रण
जब सीमित दृष्टि छोड़ कर
मेरे मर्म को अपनाओगे
हर रंग में
मुझे देख पाओगे


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका

१४ मार्च २०११   
तो     

Sunday, March 13, 2011

समर्पण का श्रृंगार


इस बार फिर
एक बूँद आंसू की
ढुलकते ढुलकते
हो गई लुप्त
समझ की किसी 
सजी-धजी क्यारी में
और
एक बार फिर
सबके बीच
अद्रश्य अकेलेपन ने
भींच कर उससे
पूछ लिया
खोई हुई 
आंसू की बूँद का पता

एक बार फिर
ठहाका लगाते हुए
अपनी ही हंसी में
परायापन सुनाई दे गया उसे


और तब
अपने मौन में
श्रद्धांजलि का नया दीप जला कर
उसने
भेजे संवेदना दूत
सात समंदर पार

अपनी भूमिका निभाने
नए सिरे से होते हुए तैयार 
उसने फिर एक बार
कर लिया
समर्पण का श्रृंगार


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
मार्च १३, २०११                   

Saturday, March 12, 2011

हमारी एक साझी पहचान है


ऐसा भी हो सकता है क्या
घर, गाड़ियाँ, दुकानें
सब के सब
अपनी गोदी में लेकर दौड़ पड़े
एक लहर

अब ऐसा भी क्या प्यार जताना 
कि
सब कुछ बिखर जाए
टूट जाए
बह जाए

गति
एकाएक
इतनी अधिक मात्रा में
भूल जाती है 
सम्मान
स्थिरता के सौंदर्य का


जीवन
जैसा हम जानते हैं
संतुलित रूप में 
चाहता है
गति और स्थिरता

क्या संतुलन सिखाने के लिए ही
हुई है सृष्टि
शब्द में संतुलन
भाव में संतुलन
खान-पान, रहन- सहन, भोग- त्याग में संतुलन
पर ऐसा क्यूं
कि प्रकृति स्वयं होकर असंतुलित
इस तरह तहस नहस कर देती है
वो सब 
जो कई कई पीढियां मिल कर बनाती हैं

क्या सबक ये है की
स्थाई कुछ भी नहीं है
और शायद ये भी कि
सब समस्याएँ साझी हैं हमारी
मिल जुल कर करना है सामना 
हर एक चुनौती का
चाहे जिस देश में हो
चाहे जिस भाषा को बोलने वाले
चाहे जिस धर्म को मानने वाले

हमारी एक साझी पहचान है की हम मनुष्य हैं
और 
कभी दुलार से
कभी प्रहार से
हमें 
मनुष्य होने का बोध करवाती है
एक शक्ति
जिससे हम हैं
और जो हमारी होते हुए भी
हमारी पकड़ से परे है हमेशा 


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
१२ मार्च २०११  

               

Friday, March 11, 2011

सत्य से हमारी दूरी


परत एक नहीं
दो नहीं
तीन नहीं
अनगिनत परतें हैं
 सत्य को हमसे छुपाती हुई भी
और
सत्य का स्पर्श हम तक पहुंचाती हुई भी

एक-एक परत हटाते हुए
नहीं देख पाते हम
नई परत का उभर आना

हमारा विरोधी खिलाड़ी 
अधिक चतुर है हमसे
पर इस 
रसमय खेल में 
एक केंद्र बिंदु ऐसा भी है
जिसे छूकर
तत्काल लुप्त हो जाती सब परतें
सुलभ हो जाता
परम-चरम
अनिर्वचनीय सर्वोत्तम

इस बिंदु को छूने के लिए
उतार कर आडम्बर की परतें
मौन साध कर
धैर्य से करनी होती प्रतीक्षा
एक अनुग्रह किरण की
जो हमें अपने आलोक में नहलाती है
इस मर्म बिंदु से सहज संपर्क जगाती है
और सहसा कृपा के ऐसे सुनहरे क्षण में
 सत्य से हमारी दूरी, पूरी तरह मिट जाती है 


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
शुक्रवार, ११ मार्च २०११   


               

Thursday, March 10, 2011

दिखता है सारा जगत

 
 
दिन के आगमन का संकेत देती
एक मद्धम उजियारी परत
बिछ गयी है आस्मां में
 
पिघलते हुए पलों में
घोल सकता हूँ
अमृत
अगर
तुम्हारी ओर देखता रहूँ
 
अब न कोई कसक, ना कोई शिकायत
ना किसी चकाचौंध का आकर्षण
 
ध्यान है अनवरत
तुम्हारी ही ओर
फिर भी
दिखता है सारा जगत
 
 
अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
१० मार्च २०११    

Wednesday, March 9, 2011

अब दृष्टि भी दो ना !


उल्लास का ज्वार सा
यह 
भोर की चुलबुली किरणों सा
कौन बिछा देता है
मन के भीतर

जाग उठता है
 शुद्ध, स्वच्छ विश्वास
जोड़ता है जो सबसे

जैसे साँसों का सृष्टि के कण कण से सम्बन्ध है
जैसे जहाँ तक जाती है दृष्टि
सब कुछ अपनेपन में नहाया सा दीखता है

और
जब अपने मौन में निमग्न
प्रकट रूप में असम्पृक्त सा सबसे 

होता हूँ
लीन अपनी पूर्णता के बोध में
तब भी
धडकता रहता है
सबके साथ समन्वित होने का
एक सुन्दर, मधुर बोध

इस क्षण की आभा में
यह असीम वैभव
है तो सबका
पर बिना देखे 
परे रह जाता है
अनुभव से

ओ दाता
दे दिया है सब कुछ
अब दृष्टि भी दो ना !  

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
बुधवार, ९ मार्च २०११  
     

Tuesday, March 8, 2011

अपने अनंत वैभव को ना भुलायेंगे


वह सब
जो सोचा नहीं गया पहले से
आ जाता है जब
सामने
बिना सोचे निकल जाते हैं
अपने रास्ते पर
अक्सर हम
पर कभी
उठाते हैं सवाल
अनपेक्षित के आगमन पर
कोसते हैं स्वयं को
उसके लिए
जिस पर हमार अधिकार नहीं

और
अनदेखा रह जाता है
वह
जो किया जा सकता था
हमारे द्वारा

यह अनकिया
मिल जाता है
भविष्य में किसी मोड़ पर
चिंतित करने वाला घेरा बन कर 
पूछता है सवाल
क्यों नहीं किया मुझे तब
अब मैं अनगढ़ हूँ
तुम भी हो रहो अधूरे

ऐसे में भी
एक कुछ है
जाग्रत हमारे भीतर
तत्पर 
हमें हर किये-अनकिये से मुक्त कर
अपनी अगम्य शोभा हमारे साथ बांटने
पर आदत ऐसी है
 'सूर्य को प्रकाशित करने वाला प्रकाश' भी
रह जाता है
अनदेखा भीतर हमारे

हां
हम असंभव को संभव कर सकते है
कभी दिन को रात बना कर
कभी रात को दिन बना कर
 आज सोच लें
तय कर लें
अपने भीतर
शाश्वत स्वर्णिम दिन अपनाएंगे
जहाँ भी जायेंगे
अपने अनंत वैभव को ना भुलायेंगे 

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
                         मंगलवार, ८ मार्च २०११                    

Monday, March 7, 2011

जिनका कोई मोल नहीं है


बस यूं ही
अच्छा लगता है
किसी संख्या का बढ़ना
किसी नए सम्बन्ध का जुड़ना
चलते चलते पहचान पक्की करने
किसी का हमारी ओर मुड़ना

बस यूं ही
अच्छा लगता है
पारस्परिक जुड़ाव
सम्मान का भाव
कुछ अच्छा करने का चाव
और चलते चलते किसी 
छायादार पेड़ के नीचे पड़ाव

बस यूं ही
अच्छी लगती हैं 
वो बातें 
जिनका कोई मोल नहीं है
जैसे पेड़ हिला कर
 शाखा पर लटकी
बारिश की बूंदों को बुलाना
थोडा सा भीगना
फिर पेड़ के नीचे से भाग जाना

बस यूं ही
ना जाने कब
हम उस दृष्टि का हिस्सा बन जाते हैं
जहाँ हर अच्छी बात की कीमत लगाना सिखाते हैं
और फिर चलते चलते बस यूं ही, हर बार
अच्छा लगने के अनुभव से बस थोड़ी दूर रह जाते हैं

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
सोमवार, ७ मार्च २०११   


  
       

Sunday, March 6, 2011

जो आधार है हम सबका


दुधमुहा दिन
तुतलाती बोली में
कोमल नन्हे हाथ से
खींच कर मेरा ध्यान
पूछ रहा है
'क्या उपहार लाये हो मेरे लिए?'


वैसे 
दिन तो स्वयं एक उपहार है
 
समझ विकसित होने पर
जान लेते हैं हम
उपहार
कहीं बाहर से नहीं आता
जो है
पहले से है
पास हमारे,

जब कोई उसे दिखा देता है
सारे जीवन को उपहार बना देता है


मेरे जीवन को उपहार बनाने वाले
जाने-अनजाने
हर सम्बन्ध के नाम

अर्पित है 
  ज्योतिर्मय दीप सा 
यह अनुपम क्षण
 जिसमें सम्मिलित हैं    
"रसमय मौन
अनिर्वचनीय संतोष
अडिग आस्था
और
नित्य शुद्ध प्रेम"

अब मुखरित संवाद गंगा में
कर यह 'मंगल दीप' प्रवाहित
हो रहा तन्मय
ले शरण इस
चिर-ज्योत्स्ना की
जो आधार है हम सबका


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
रविवार, ६ मार्च २०११    

       
     

Saturday, March 5, 2011

जिससे निकलते हैं सारे रंग


तो फिर
अपने-अपने रंग बिखेर कर
दोनों ने
देखा
एक नए रंग का उद्भव
और उस नए रंग में
ढूँढने लगे 
अपना-अपना रंग


और फिर
नए रंग के साथ
नया रिश्ता बनाते हुए
बदलता गया 
दोनों का
अपना-अपना रंग


उसने 
एक आम सी सड़क पर
एक सामान्य से मोड़ पर
सहसा देख लिया
वो रंग
जिससे निकल कर आये
सारे रंग
और
उछल कर
चिल्ला कर
झूम कर
गा गाकर
लहरा कर
प्रेम प्रवाह में
भीगा हुआ
आनंद रस में मगन
वो
सोचने लगा
हवा में अदृश्य नगाड़े बजा बजा कर
क्या सब तक पहुंचा दूं इस  'एक रंग' के होने की खबर?


और फिर
उसने देखा
एक रंग का विभक्त होकर
फैलना
अलग अलग रूप लेना
अलग अलग स्थितियों का सृजन कर
अलग अलग अनुभव उंडेलना

सब कुछ बनते हुए भी
बिना बदले
बना रहा एक रंग
यूँ ही मुस्कुराता हुआ
उसके मौन का मधुर सखा

और फिर एक क्षण
तृप्ति से तरंगित
असीम शांति के रस का रूप लेकर
इस तरह बैठ गया 
उसके भीतर
की
स्वतः तिरोहित हो गयी
किसी को कुछ कहने 
किसी को कुछ बताने
किसी को कुछ जताने की चाह

पर पलट कर
श्रद्धा से देखा उसने
सामान्य गली के मोड़ को
इस बोध के साथ की
हर सामान्य स्थल में
छुपा हुआ है
वह रंग
जो असाधारण है
विशिष्ट है
परिपूर्ण करने वाला है

अहा
चलते चलते
अभिवादन करते
बतियाते
हर क्रिया को अपनाते
उसे हुआ अनुभव
सब कुछ जोड़ता हुआ
एक महामौन घुला हुआ है
उसकी हर सांस में
जिससे निरंतर, निः सृत
हो रहीं मंगल कामनाएं
सबके लिए अकारण ,
शायद ये स्वभाव है 
इस महामौन का
जो एकमेक है
एक रंग से
जिससे  निकलते हैं
सारे रंग 


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
शनिवार, ५ मार्च २०११                      
    
      

Friday, March 4, 2011

हमारी पहचान की कहानी


निशान
बोलते हैं
हमारी पहचान की कहानी


निशान वो
जो छूट जाते हैं
हमारे जाने के बाद
जैसे रेत पर
नंगे पांवों के चिन्ह

हमारा चलना
चिन्ह बनाने के लिए नहीं
चिन्ह तो बनते हैं
अपने आप 
पर बनते बनते
बना देते
हमारी पहचान 

2

कभी यूं भी होता है
उसी तरह अपने आप मिट भी
जाता
कुछ पदचिन्हों का अस्तित्त्व
पर कभी
ये सारगर्भित, दिशाबोध से भरे
चरण चिन्ह

आत्मनिष्ठा का पाठ पढ़ते हैं
 अनंत वैभव की गाथा गाते हैं
और अपनी करूणा से द्रवित
हमें जीने की कला सिखाते हैं 

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
                        शुक्रवार, ४ मार्च 2011                 

Thursday, March 3, 2011

अपने ही लिए



लो तोड़ लो
पक गया है फल
बुला कर कहता दिखा
साधना वृक्ष
और
एक परिपूर्ण मौन में
स्वाद फल का
फ़ैल गया
हर तरफ


सीमा आरोपित नहीं
स्वतः स्फूर्त
सहजता से बनती गयी जो
अपनी ही पहचान की तरह

उस सृजनात्मक सीमा में भी
गाता रहा असीम
जैसे
अपने ही आंगन में
गुनगुना रहा हो
कोई कालातीत गीत
अपने ही लिए


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
                          गुरुवार, ३ मार्च २०११                      

Wednesday, March 2, 2011

जरूरी है जो जीवन के लिए


वह 
जरूरी है जो जीवन के लिए
उसे लेकर
होता जाता है 
सब कुछ समन्वित

बोध इसका सुलभ है
धरती से
जल से
अग्नि से
वायु से
और आकाश से
पर
हम वहां देखते हैं
जहाँ जरूरी नहीं
गैर-जरूरी उभर  आता है
हमारा हिस्सा बन जाता है
और
पग पग पर
एक नयी टूटन से हमारा परिचय करवाता है

शांति का अथाह सागर
जो बिलकुल यहाँ है
पास में अपने
साथ में अपने
एक मरीचिका सा लगने लग जाता है


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
बुधवार, ३ मार्च २०११        

Tuesday, March 1, 2011

सबसे बहुमूल्य जो है


स्वर्णिम दिन
को आलिंगनबद्ध करने
बढाता हूँ हाथ
बीच में आ जाता है कोलाहल


सवाल वही पुराने
उठ जाते हैं
अपने अधूरेपन का झंडा उठाये
शोर मचा कर
तोड़ते हैं
एकाग्रता की तान



मेरे पास
सबसे बहुमूल्य जो है
वो है मेरा ध्यान

जबसे ये समझ कर
हर क्षण की ओर देने लगा हूँ ध्यान

शोर को पार कर
असीम की अनाम आभा में घुल जाना
होने लगा है आसान

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
                         मंगलवार, १ मार्च २०११                 

आनंदित निर्झर

छम छम बरसे प्रेमामृत सा खिला करूण अलोक अपरिमित मौन मधुर झीना झीना सा सरस सूक्ष्म  आनंदित निर्झर तन्मय बेसुध  लीन....  ...