Thursday, March 17, 2011

आग्रहों के अतिक्रमण को हटा कर



मौन ही हो आस पास
हमेशा
ना आवश्यक है
ना संभव

मौन अपने भीतर
मधुर रस के साथ
बनाए रखने का अभ्यास
करते हुए
सिखाता है कोइ
बंधन रहित जुड़ाव
और
जुड़ाव रहित बंधन 

 
धैर्य के साथ
श्रद्धा के स्वर्णिम आलोक में
हीरे को तराशने वाले कारीगर की तरह
देख कर
खट्टे-मीठे अनुभव
एक काँटा यहाँ हटाता हूँ
एक चुभन वहां मिटाता हूँ
अनंत के स्मरण से
क्षमाशीलता की सौरभ पाता हूँ  
आग्रहों के अतिक्रमण को हटा कर
फिर से नया हो जाता हूँ  


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
गुरुवार, १७ मार्च 2011 
                

3 comments:

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

सिखाता है कोइ
बंधन रहित जुड़ाव
और
जुड़ाव रहित बंधन

बहुत सुन्दर ...अच्छी प्रस्तुति

प्रवीण पाण्डेय said...

आग्रहो का अतिक्रमण हटाना पड़ेगा, बहुत ही सुन्दर विचार।

Ashok Vyas said...

dhanyawaad Sangeetaji aur
Praveenjee.
mukti kee anubhuti sulabh ho hamein,
aisee prarthna sahit

आनंदित निर्झर

छम छम बरसे प्रेमामृत सा खिला करूण अलोक अपरिमित मौन मधुर झीना झीना सा सरस सूक्ष्म  आनंदित निर्झर तन्मय बेसुध  लीन....  ...