Wednesday, March 16, 2011

आनंद की उछाल


वह जो दिखता है
उसके पीछे वह है
जो दिखता नहीं
पर है

एक वह
जो है
जो रचता है
रचता है स्वयं से
स्वयं को
और
खेलता है खेल 
खोने और पाने का


एक वह
अपने आनंद की उछाल 
प्रकट करता है
छुप छुप कर

जो दीखता है
उससे परे
अद्रश्य को देख कर
संचरित होता है जो आनंद मुझमें
उसे मैं गाता हूँ
या वो ही
मेरे अलग अलग कर्मों से मुझे गाता है
       लौकिक-अलौकिक का भेद मिटाता है          


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
१६ मार्च २०११  

3 comments:

प्रवीण पाण्डेय said...

रेत के धरौंदों का खेल।

वन्दना said...

जो दीखता है
उससे परे
अद्रश्य को देख कर
संचरित होता है जो आनंद मुझमें
उसे मैं गाता हूँ
या वो ही
मेरे अलग अलग कर्मों से मुझे गाता है
लौकिक-अलौकिक का भेद मिटाता है

इसी दिव्य आनन्द मे ही तो डूबती उतरती रहती हूँ……………भावो को शब्द दे दिये……………आभार्।

Ashok Vyas said...

Dhanywaad Praveenjee
Badhaeeyan Vandanajee
shubh kaamnaon sahit

आनंदित निर्झर

छम छम बरसे प्रेमामृत सा खिला करूण अलोक अपरिमित मौन मधुर झीना झीना सा सरस सूक्ष्म  आनंदित निर्झर तन्मय बेसुध  लीन....  ...