Wednesday, March 30, 2011

बैठ कर शिखर पर


यह जो
शुद्ध, सौम्य आलोक प्रवाह
उछल उछल कर
हो रहा है
प्रवाहित
अनवरत
इसकी एकरसता में भी
कितनी विविधता है
इसकी एक तान में
उद्घाटित है
कितना सौन्दर्य

बैठ कर
शिखर पर
देखता हूँ
किरण उज्जवल
नहीं बिटिया सी
खेलती है
मेरी गोद में
और
चूम कर मेरा भाल
नहला देती है मुझे
अमृतघट उंडेल कर 
जैसे कभी
गंगा ने छू लिया था
भागीरथ के पूर्वजों को


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
बुधवार, ३० मार्च २०११   

              

1 comment:

प्रवीण पाण्डेय said...

सुन्दरतम परिकल्पना।

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