Thursday, March 31, 2011

हर धड़कन में प्यार जगाएं


चल जीवन का रस भर लायें
सुन्दरतम को गले लगाएं
जिससे सब अपना हो जाए
चलो, आज उसको अपनाएँ

निर्णय कर लेने का क्षण है
बंधन छोड़, मुक्त हो जाएँ
अपने होने की आभा को
करें उजागर, अब न छुपायें

जीवन हर दिन नया नया है
नूतनता को सखी बनाएं
जो दीखता है, उससे आगे
अनदेखे से आँख मिलाएं

वो जो फूल फूल खिलता है
उसे अधर पर आज बिठाएं
करें असंभव को अब संभव
हर धड़कन में प्यार जगाएं

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
३१ मार्च २०११   
      
 


    

2 comments:

anupama's sukrity ! said...

sunder soch -
pravahmayi kavita.

प्रवीण पाण्डेय said...

हर धड़कन में प्यार जगायें,
बहुत सुन्दर।

आनंदित निर्झर

छम छम बरसे प्रेमामृत सा खिला करूण अलोक अपरिमित मौन मधुर झीना झीना सा सरस सूक्ष्म  आनंदित निर्झर तन्मय बेसुध  लीन....  ...