Friday, March 11, 2011

सत्य से हमारी दूरी


परत एक नहीं
दो नहीं
तीन नहीं
अनगिनत परतें हैं
 सत्य को हमसे छुपाती हुई भी
और
सत्य का स्पर्श हम तक पहुंचाती हुई भी

एक-एक परत हटाते हुए
नहीं देख पाते हम
नई परत का उभर आना

हमारा विरोधी खिलाड़ी 
अधिक चतुर है हमसे
पर इस 
रसमय खेल में 
एक केंद्र बिंदु ऐसा भी है
जिसे छूकर
तत्काल लुप्त हो जाती सब परतें
सुलभ हो जाता
परम-चरम
अनिर्वचनीय सर्वोत्तम

इस बिंदु को छूने के लिए
उतार कर आडम्बर की परतें
मौन साध कर
धैर्य से करनी होती प्रतीक्षा
एक अनुग्रह किरण की
जो हमें अपने आलोक में नहलाती है
इस मर्म बिंदु से सहज संपर्क जगाती है
और सहसा कृपा के ऐसे सुनहरे क्षण में
 सत्य से हमारी दूरी, पूरी तरह मिट जाती है 


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
शुक्रवार, ११ मार्च २०११   


               

3 comments:

anupama's sukrity ! said...

और सहसा कृपा के ऐसे सुनहरे क्षण में
सत्य से हमारी दूरी, पूरी तरह मिट जाती है


असीम प्रभु कृपा पाकर मन शांत हो जाता है .
बहुत सुंदर रचना -
सत्य के समीप ले जाती हुई .

प्रवीण पाण्डेय said...

पर कभी कभी तो एक परत उघाड़ने पर ही सत्य दिख जाता है।

Ashok Vyas said...

anupamaji aur praveenjee ko naman ke saath dhanyawaad

आनंदित निर्झर

छम छम बरसे प्रेमामृत सा खिला करूण अलोक अपरिमित मौन मधुर झीना झीना सा सरस सूक्ष्म  आनंदित निर्झर तन्मय बेसुध  लीन....  ...