Thursday, March 10, 2011

दिखता है सारा जगत

 
 
दिन के आगमन का संकेत देती
एक मद्धम उजियारी परत
बिछ गयी है आस्मां में
 
पिघलते हुए पलों में
घोल सकता हूँ
अमृत
अगर
तुम्हारी ओर देखता रहूँ
 
अब न कोई कसक, ना कोई शिकायत
ना किसी चकाचौंध का आकर्षण
 
ध्यान है अनवरत
तुम्हारी ही ओर
फिर भी
दिखता है सारा जगत
 
 
अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
१० मार्च २०११    

3 comments:

anupama's sukrity ! said...

ध्यान है अनवरत
तुम्हारी ही ओर
फिर भी
दिखता है सारा जगत


बहुत सुंदर अनुभूति .
badhai .

प्रवीण पाण्डेय said...

ध्यान की परमावस्था।

Ashok Vyas said...

dhanywaa anupamaji aur Praveenjee

आनंदित निर्झर

छम छम बरसे प्रेमामृत सा खिला करूण अलोक अपरिमित मौन मधुर झीना झीना सा सरस सूक्ष्म  आनंदित निर्झर तन्मय बेसुध  लीन....  ...