Sunday, March 13, 2011

समर्पण का श्रृंगार


इस बार फिर
एक बूँद आंसू की
ढुलकते ढुलकते
हो गई लुप्त
समझ की किसी 
सजी-धजी क्यारी में
और
एक बार फिर
सबके बीच
अद्रश्य अकेलेपन ने
भींच कर उससे
पूछ लिया
खोई हुई 
आंसू की बूँद का पता

एक बार फिर
ठहाका लगाते हुए
अपनी ही हंसी में
परायापन सुनाई दे गया उसे


और तब
अपने मौन में
श्रद्धांजलि का नया दीप जला कर
उसने
भेजे संवेदना दूत
सात समंदर पार

अपनी भूमिका निभाने
नए सिरे से होते हुए तैयार 
उसने फिर एक बार
कर लिया
समर्पण का श्रृंगार


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
मार्च १३, २०११                   

7 comments:

वन्दना said...

समर्पण का श्रृंगार इससे सुन्दर और क्या होगा…………बेहतरीन , लाजवाब अभिव्यक्ति।
कल के चर्चामंच पर आपकी रचना लगी है।

प्रवीण पाण्डेय said...

बहुत ही सुन्दर रचना, सहज से भाव मन के, शब्द पाते हुये।

वाणी गीत said...

समर्पण का श्रृंगार ...
सुन्दर अभिव्यक्ति !

अजय कुमार said...

अच्छी रचना , बधाई

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

बहुत सुन्दर भाव ..

Dr (Miss) Sharad Singh said...

बहुत सुन्दर और भावपूर्ण कविता के लिए हार्दिक बधाई।

Ashok Vyas said...

vanadnaji, praveenji, vaaneeje, ajay ji,
sangeetaji aur Sharad Singhji
ko rasmay abhaar

आनंदित निर्झर

छम छम बरसे प्रेमामृत सा खिला करूण अलोक अपरिमित मौन मधुर झीना झीना सा सरस सूक्ष्म  आनंदित निर्झर तन्मय बेसुध  लीन....  ...