Tuesday, March 1, 2011

सबसे बहुमूल्य जो है


स्वर्णिम दिन
को आलिंगनबद्ध करने
बढाता हूँ हाथ
बीच में आ जाता है कोलाहल


सवाल वही पुराने
उठ जाते हैं
अपने अधूरेपन का झंडा उठाये
शोर मचा कर
तोड़ते हैं
एकाग्रता की तान



मेरे पास
सबसे बहुमूल्य जो है
वो है मेरा ध्यान

जबसे ये समझ कर
हर क्षण की ओर देने लगा हूँ ध्यान

शोर को पार कर
असीम की अनाम आभा में घुल जाना
होने लगा है आसान

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
                         मंगलवार, १ मार्च २०११                 

4 comments:

Rashmi savita @ IITR said...

सवाल वही पुराने
उठ जाते हैं
अपने अधूरेपन का झंडा उठाये
शोर मचा कर
तोड़ते हैं
एकाग्रता की तान .......
exactly true.
...nice explanation...nice poetry.

प्रवीण पाण्डेय said...

शरीर के शोर के पार ही मन की शान्ति है।

Ashok Vyas said...

Dhanywaad Rashmiji aur Praveenjee
is shubhkaamna ke saath kee ham sab
'bahoomooly' ke prati sajag rahen

MAHENDRA KUMAR PUROHIT said...

sandar hey sa.....bahut jordar

आनंदित निर्झर

छम छम बरसे प्रेमामृत सा खिला करूण अलोक अपरिमित मौन मधुर झीना झीना सा सरस सूक्ष्म  आनंदित निर्झर तन्मय बेसुध  लीन....  ...