Wednesday, March 2, 2011

जरूरी है जो जीवन के लिए


वह 
जरूरी है जो जीवन के लिए
उसे लेकर
होता जाता है 
सब कुछ समन्वित

बोध इसका सुलभ है
धरती से
जल से
अग्नि से
वायु से
और आकाश से
पर
हम वहां देखते हैं
जहाँ जरूरी नहीं
गैर-जरूरी उभर  आता है
हमारा हिस्सा बन जाता है
और
पग पग पर
एक नयी टूटन से हमारा परिचय करवाता है

शांति का अथाह सागर
जो बिलकुल यहाँ है
पास में अपने
साथ में अपने
एक मरीचिका सा लगने लग जाता है


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
बुधवार, ३ मार्च २०११        

1 comment:

प्रवीण पाण्डेय said...

स्वयं से हो साक्षात्कार।

आनंदित निर्झर

छम छम बरसे प्रेमामृत सा खिला करूण अलोक अपरिमित मौन मधुर झीना झीना सा सरस सूक्ष्म  आनंदित निर्झर तन्मय बेसुध  लीन....  ...