Thursday, March 3, 2011

अपने ही लिए



लो तोड़ लो
पक गया है फल
बुला कर कहता दिखा
साधना वृक्ष
और
एक परिपूर्ण मौन में
स्वाद फल का
फ़ैल गया
हर तरफ


सीमा आरोपित नहीं
स्वतः स्फूर्त
सहजता से बनती गयी जो
अपनी ही पहचान की तरह

उस सृजनात्मक सीमा में भी
गाता रहा असीम
जैसे
अपने ही आंगन में
गुनगुना रहा हो
कोई कालातीत गीत
अपने ही लिए


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
                          गुरुवार, ३ मार्च २०११                      

1 comment:

प्रवीण पाण्डेय said...

परमार्थियों का जीवन है यह।

वहाँ जो मौन है सुंदर

वह जो लिखता लिखाता है कहाँ से हमारे भीतर आता है कभी अपना चेहरा बनाता कभी अपना चेहरा छुपाता है वह जो है शक्ति प्रदाता  ...