Saturday, March 5, 2011

जिससे निकलते हैं सारे रंग


तो फिर
अपने-अपने रंग बिखेर कर
दोनों ने
देखा
एक नए रंग का उद्भव
और उस नए रंग में
ढूँढने लगे 
अपना-अपना रंग


और फिर
नए रंग के साथ
नया रिश्ता बनाते हुए
बदलता गया 
दोनों का
अपना-अपना रंग


उसने 
एक आम सी सड़क पर
एक सामान्य से मोड़ पर
सहसा देख लिया
वो रंग
जिससे निकल कर आये
सारे रंग
और
उछल कर
चिल्ला कर
झूम कर
गा गाकर
लहरा कर
प्रेम प्रवाह में
भीगा हुआ
आनंद रस में मगन
वो
सोचने लगा
हवा में अदृश्य नगाड़े बजा बजा कर
क्या सब तक पहुंचा दूं इस  'एक रंग' के होने की खबर?


और फिर
उसने देखा
एक रंग का विभक्त होकर
फैलना
अलग अलग रूप लेना
अलग अलग स्थितियों का सृजन कर
अलग अलग अनुभव उंडेलना

सब कुछ बनते हुए भी
बिना बदले
बना रहा एक रंग
यूँ ही मुस्कुराता हुआ
उसके मौन का मधुर सखा

और फिर एक क्षण
तृप्ति से तरंगित
असीम शांति के रस का रूप लेकर
इस तरह बैठ गया 
उसके भीतर
की
स्वतः तिरोहित हो गयी
किसी को कुछ कहने 
किसी को कुछ बताने
किसी को कुछ जताने की चाह

पर पलट कर
श्रद्धा से देखा उसने
सामान्य गली के मोड़ को
इस बोध के साथ की
हर सामान्य स्थल में
छुपा हुआ है
वह रंग
जो असाधारण है
विशिष्ट है
परिपूर्ण करने वाला है

अहा
चलते चलते
अभिवादन करते
बतियाते
हर क्रिया को अपनाते
उसे हुआ अनुभव
सब कुछ जोड़ता हुआ
एक महामौन घुला हुआ है
उसकी हर सांस में
जिससे निरंतर, निः सृत
हो रहीं मंगल कामनाएं
सबके लिए अकारण ,
शायद ये स्वभाव है 
इस महामौन का
जो एकमेक है
एक रंग से
जिससे  निकलते हैं
सारे रंग 


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
शनिवार, ५ मार्च २०११                      
    
      

2 comments:

प्रवीण पाण्डेय said...

सब रंगों का एक सहारा,
उसकी लौ में हृदय हमारा,

Ashok Vyas said...

dhanyawaad Praveenjee
bahe nitya anand kee dhaara
khel dhyaan par tika hai saara

आनंदित निर्झर

छम छम बरसे प्रेमामृत सा खिला करूण अलोक अपरिमित मौन मधुर झीना झीना सा सरस सूक्ष्म  आनंदित निर्झर तन्मय बेसुध  लीन....  ...