Friday, March 25, 2011

तुम्हारी मुस्कान के अनंत खेल





हो तो ये भी सकता था शायद
की मैं देखते ही पहचान लेता तुम्हें
तुम्हारे स्पर्श से ही समझ लेता
वह सब
जो अब तक नहीं समझा हूँ

पर अब 
जितना जितना देखा
जितना जितना जाना
जितना जितना समझा है तुम्हें
मुझे नित्य उल्लास से भरता है

तुम्हारे प्रवाह का अंश
पर तुमसे अपरिचित
कैसे संभव हो रहा इतने बरस

शायद फिर किसी लहर की उछल
ले जा सकती है
यह स्वर्णिम स्मृति
जो मुझ पर
तुम्हारा परिचय खोलती है

मुस्कुरा कर देखता हूँ
तुम्हारी मुस्कान के अनंत खेल

और 
हँसते हँसते
अपने में ही मगन हो जाता हूँ

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
२५ मार्च 2011           

3 comments:

प्रवीण पाण्डेय said...

यह अनुभव कि वह साथ है, मगन कर देने के लिये पर्याप्त है।

Sharad said...

Incredible work, Ashok ji.
"har din ek nayee kavita, ek nayee umang,ek nayee jeeney ki tummanna aap ki en punktiyon mein nazar aati hai"...ishwar ki kripa, aapke purusharth dwara hum tuk pahunchte hain,
Hum aabhari hain us divya daata ke jisne aapse yeh sanyog rachaa!

sharad c. jaitly

anupama's sukrity ! said...

bhavpoorna krity,sunder anubhuti se bhari .

वहाँ जो मौन है सुंदर

वह जो लिखता लिखाता है कहाँ से हमारे भीतर आता है कभी अपना चेहरा बनाता कभी अपना चेहरा छुपाता है वह जो है शक्ति प्रदाता  ...