Monday, March 7, 2011

जिनका कोई मोल नहीं है


बस यूं ही
अच्छा लगता है
किसी संख्या का बढ़ना
किसी नए सम्बन्ध का जुड़ना
चलते चलते पहचान पक्की करने
किसी का हमारी ओर मुड़ना

बस यूं ही
अच्छा लगता है
पारस्परिक जुड़ाव
सम्मान का भाव
कुछ अच्छा करने का चाव
और चलते चलते किसी 
छायादार पेड़ के नीचे पड़ाव

बस यूं ही
अच्छी लगती हैं 
वो बातें 
जिनका कोई मोल नहीं है
जैसे पेड़ हिला कर
 शाखा पर लटकी
बारिश की बूंदों को बुलाना
थोडा सा भीगना
फिर पेड़ के नीचे से भाग जाना

बस यूं ही
ना जाने कब
हम उस दृष्टि का हिस्सा बन जाते हैं
जहाँ हर अच्छी बात की कीमत लगाना सिखाते हैं
और फिर चलते चलते बस यूं ही, हर बार
अच्छा लगने के अनुभव से बस थोड़ी दूर रह जाते हैं

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
सोमवार, ७ मार्च २०११   


  
       

1 comment:

प्रवीण पाण्डेय said...

पता नहीं अच्छा लगने की चाह में किनारे पहुँचने से पहले ही आस छोड़ बैठे।

कविता

कविता न नारा न विज्ञापन कविता सत्य खोजता मेरा मन कविता न दर्शन न प्रदर्शन कविता अनंत से खेलता बचपन कव...