Monday, March 14, 2011

धारा की छेड़-खानी


विनाश का चेहरा भी
कितने रूप और प्रभाव लिए होता है
किसी का मिटता है संसार
किसी का मनोरंजन होता है

और फिर 
ठहर गयी मानस में 
धारा की छेड़-खानी 
मिटते हुए चित्रों में
छुपी अमिट कहानी
सुन्न हो गया मन
मंद हो गयी रवानी
प्यास नहीं प्यासों को 
लील गया पानी



अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
१४ मार्च २०११ 
शाम सभा  
  
 

2 comments:

प्रवीण पाण्डेय said...

प्रकृति का कुद्धनाद।

अरूण साथी said...

सुन्न हो गया मन
मंद हो गयी रवानी
प्यास नहीं प्यासों को
लील गया पानी


सही कहा सरजी यह धरा से छेड़खानी का ही परिणाम है। एकमद सटीक लिखा।

आनंदित निर्झर

छम छम बरसे प्रेमामृत सा खिला करूण अलोक अपरिमित मौन मधुर झीना झीना सा सरस सूक्ष्म  आनंदित निर्झर तन्मय बेसुध  लीन....  ...