Monday, March 21, 2011

शाश्वत का जादू




बदलता नहीं है रास्ता
वही भाव
वही शांति
वही अधीरता
स्वीकारने के सुख के
साथ साथ
अस्वीकृति का तानपूरा

बदलता नहीं हूँ मैं
वही स्वाद
वही चोट
वही तुतलाहट
वही उठ कर चलने 
और क्षितिज से हाथ मिलाने की ललक

वही रास्ता, वही मैं
पर धीरे धीरे
ना जाने किस अनदेखे क्षण में
बदला है 
रास्ते से मेरा सम्बन्ध


और अब
विराट की मुस्कान
मुझसे खेलते हुए
मुझे दिखाने भी
लगी है
खेल की बारीकियां

सब कुछ सरल होते हुए भी
कितना मुश्किल है

जानते हुए भी
अस्वीकार कर खुदको
 बढ़ा देते हैं हम
ऊंचाई सीढ़ियों की 

और फिर
समझ के नए स्वर
जब फिर से  छोटा करते हैं
सीढ़ियों को

वही पुराना गीत गाते हुए
आगे बढ़ते
हम ये सोचते हैं
कि अभी-अभी बना है ये गीत

रास्ते और मेरे बीच का 
बदलता हुआ सम्बन्ध
पुराने को इस तरह नया करता है
की रास्ता नया लगता है
मैं भी नया नया लगता हूँ खुदको

तो शायद
शाश्वत का जादू
खिलता है
सम्बन्ध के द्वारा ही
और 
जुड़े बिना शायद
खुल ही नहीं सकता विस्तार हमारा

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
सोमवार, २१ मार्च २०११   


                 

1 comment:

प्रवीण पाण्डेय said...

अनन्त से जुड़ कर ही सृजनात्मकता बनी रहती है।

आनंदित निर्झर

छम छम बरसे प्रेमामृत सा खिला करूण अलोक अपरिमित मौन मधुर झीना झीना सा सरस सूक्ष्म  आनंदित निर्झर तन्मय बेसुध  लीन....  ...