Wednesday, November 30, 2011

अनंत की माधुरी

 
कर्म की आपा-धापी नहीं
हंस की तरह
तैरता मन
मुस्कुरा कर 
करता है
अभिवादन 
हर दिशा का
 
गति के सौन्दर्य में
सुन लेता है
तृप्ति के सुर
अनायास ही
 
यह
गति और स्थिरता के बीच का 
सहज साम्य 
 यह
मौन में अनंत की माधुरी का
अवतरण
और
पग पग पर मुक्ति गाथा का
उदार अनावरण
 
यहाँ पहुँचने पर
न कोई पताका फहराने की बाध्यता
न ढोल-नगारों से उत्सव मनाने का दबाव
 
अखबार की खबर नहीं है
माँ द्वारा शिशु को गोद में उठाना
थपथपा कर सुलाना
 
आत्म-दरसन में प्रदर्शन कैसा
बस
       बस परमानंद का यह गाढा अनुभव     
जो करवाए करो
जो कहलाये कहो
अपने सारे संकल्प उसे अर्पित कर
यूँ ही मस्त रहो
 
 
अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
३० नवम्बर २०११   
             

Tuesday, November 29, 2011

पंख तुम्हारे अपने हैं

(स्वामी श्री ईश्वारानंद गिरिजी महाराज)चित्र- चंद्रशेखर
 
वो कहाँ से लाता है
पंख
इतने सुन्दर
इतने प्रखर
इस तरह मुक्ति की उड़ान का अनुभव
सुलभ करवाने वाले
 
सोच कर
देखा जब उसकी तरफ
 
नहीं लगता उसे देख कर
वो इतने सही माप वाले पंख
मेरे लिए
कहीं से लाने का कार्य करे
वह तो
मगन है
तन्मय है
अपने परम मुक्ति के सिंहासन पर आसीन
मुग्ध हर सांस के अमृतमय संगीत को सुनता
असीम मुस्कान का उजियारा छिटकाता
 
तो फिर ये पंख
प्रश्न सुन कर
मौन में कह दिया 
उसकी करूणामय दृष्टि ने
'पंख तुम्हारे अपने हैं
नित्य तुम्हारे साथ हैं
मैं तो बस बोध जगाता हूँ
तुम क्या हो
ये तुम्हें बताता हूँ'
 
 
अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
२९ नवम्बर २०११                  

Monday, November 28, 2011

सौम्य सुन्दरता


कैसे इतना सारा सौंदर्य उंडेल देता है दिन
देखो उजले आकाश से
उतरता यह सुनहरापन
पेड़ों पर
सड़क पर
हवा के रेशे रेशे में
घुल कर
बोल रहा है
मौन किसका
अबकी बार
आनंद के आगमन पर
नहीं लगाई 
कोइ प्रदर्शनी  उसने
बस तिरता रहा
गंगा की लहरों पर
आँखें मूंदे
पूरी सजगता के साथ
भरता रहा अंतस में
अनंत की आशीष
और
उसे केंद्र बना कर
फैलता रहा आनंद का
नूतन भाव
खुलता रहा
कण कण में
सौन्दर्य का एक नया संगीत
इस बार वह जान पाया 
संगीत वह है
जो एक कर देता है
बाहर और भीतर को
कुछ ऐसे
की एक अनाम क्षण में
तिरोहित हो जाता है
अपने अलगाव का भाव
बस
वह रहता है
एक वह
जिसके मौन से 
प्रकटित होता
सुनहरापन,
फैला देता हर दिशा में
सौम्य सुन्दरता 


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
 २८ नवम्बर २०११  
     

Sunday, November 27, 2011

अनंत के आँगन में

नरम घास की नोक से
ओस की बूँद
अपने ह्रदय पर लगा कर
शीतलता का नया श्रृंगार कर
उसे लगा
आकाश मुस्कुराया
और
उसके चेहरे पर
परिधियों की पहचान नकारती मुस्कान
उमड़ आई
कुछ ऐसे
जैसे
छिटक गया हो
सूरज का उजाला
चारों दिशाओं में
 
 
 
उड़ती चिड़िया 
उड़ते उड़ते
किसी निश्छल, तृप्त क्षण में
नृत्य सा 
करती है
गगन मंच पर जैसे
 
पवन के आलिंगन से
झूम झूम
अपनी कृतकृत्यता गाती हैं
जैसे फ़ैली हुई शाखाएं
 
या फिर
नन्हा बालक
अपनी ही मस्ती में
रच लेता है
खेल संसार
और
परिचित वस्तुओं में
उद्घाटित कर देता है
एक नया आयाम
 
कुछ ऐसे ही
अपनी वस्त्र भीगने से बचाती
धीरे धीरे पग धरती
सुन्दरी की तरह
पार कर 
बरसाती नदी
 
उसके मन ने
लांघ कर सीमाबद्ध सन्दर्भ
अनंत के आँगन में
कुछ देर के लिए
छोड़ कर
अपना आकार
कर दिया उजागर 
      असीम आनंद          
 
 
अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
२७ नवम्बर २०११   
         

Saturday, November 26, 2011

संभावना की ओस लेकर




( सीमा कोहली जी के चित्रों  की न्यूयार्क में आयोजित प्रदर्शनी से प्रेरित चार कवितायेँ-२०११)
कवि - अशोक व्यास


कमल दर कमल
सृजनपुष्प श्रृंखला
स्वर्णिम वृत्त

वृक्ष से है वह
या उससे वृक्ष

वह जो देती है
कहाँ से पाती है सब कुछ

शाखा शाखा
धमनी-धमनी

साथ-साथ चलते
कोलाहल और नीरवता

स्वर्ण मेघ बरसाते हैं
परकोटे पर

आभा के
विस्तृत उत्स में
विलीन होकर
उद्भव होता
पूर्णता का






कमल की कोख से
प्रस्फुटित मनीषा
विराजित है परिधि पर

खिली हुई उमंगों का नृत्य
बाहें फैला कर
उड़ा रही वह
अगणित पक्षी
स्वर्णमयी चेतना के

वृक्ष की जड़ो से
सोंख-सोंख
अँधेरे- उजियारे सन्देश
भूगर्भ के

रचती है वह
दो विपरीत संसार
अपने अट्टहास में

भ्रमित कर कर
बढ़ा देती
छटपटाहट पूर्णता की




कमल दर कमल
समाधिस्थ व्योम कन्या
रचती है
स्वयं को,
स्वयं से स्वयं तक
पहुंचाती शाखाएं

बहाव का स्वर
हहरा कर
प्रकट करता
सौम्य ज्योत्स्ना का
सुनहरा वृत्त

जिसमें
व्याप्त है
एक भंवर
ऊहापोह
जड़ से जुड़े अंधियारे
और
फुनगियों पर ठहरी
संभावना की ओस लेकर
रचे कुछ नया
या मुट्ठी  में भर कर
इस क्षण की जड़ता
लौटा दे
चुनौती सृष्टि की
कमल नाल तक
फिर से





फूल वसंत के
नहीं ले सकती
जड़ में बैठ कर

समाधि से विलग हो
काले पंछियों से
कर रही संवाद वह
पूछ रही
पता मुक्ति का

यूँ
मुक्ति लुटाती रही है वह
पर
रसीले फलों संग
एकमेक होने के लिए
स्वतंत्र न हो पाने की
छटपटाहट
धरी है
इस बार
उसकी हथेली पर


- अशोक व्यास




लहरों के नृत्य में

उसे नहीं मालूम था
एक बुलबुला सा
दीखता है जो हथेली पर
किरणों के स्पर्श से
इस बार
पाने लगेगा विस्तार
और
फ़ैल कर इतना बड़ा हो जायेगा इस बार
की उसमें समा जाए सारा संसार
 
 
उसे नहीं मालूम था
शताब्दियों पहले से
उसके मन की माटी में
धरे बीज
एक दिन फिर से
यूँ अंकुरित होकर
उसके प्रति 
खोल देंगे
परिचय की
विस्मयकारी स्वर्णिम फसल
 
 
उसे नहीं मालूम था
जन्म उसका
एक बार नहीं
बार बार होता है
और
इस तरह अपने भीतर
घटित होते के दरसन करना
सुलभ करवा देता है
स्थिर मुक्ति का
चिर आनंदमय स्पर्श
 
 
उसे मालूम था
अनावरण का यह क्रम
जिसके स्मरण से
जाग्रत हुआ है
उसके चरणों तक
ले जाने वाली
समर्पण नदी का उद्गम
जिस पर्वत से हुआ है
उस पर्वत पर भी
विद्यमान है
उसी की
करुनामय मुस्कान की
सुरभित आभा
 
 
वह अपनी चेतना की कोर से
देख रहा था
युगों का प्रवाह आज जब
मौन में
अब भी झलक रहा था
तात्कालिक सन्दर्भों का बोध
और
सब कुछ जान कर
फिर उसे जान पडा
की 
उसे अब भी सीखना है
दो कदम चलना
दिशाओं के छल के बीच
अपनी धुरी पर संभलना
और लहरों के नृत्य में
बिना उछले उछलना
 
 
 
अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका  

२६ नवम्बर 2011
              

Friday, November 25, 2011

होने ना होने से परे का होना

 
गाय के थन से निकलते
ताज़े दूध की तरह
यह जो
एक गर्माहट है
शीतलता के प्रादुर्भाव की
इसको 
कैसे जगा देता है
मेरे भीतर 
तुम्हारे स्मरण
 
 
किस पात्र में
सहेजूँ
यह अमृत की बूँदें
जिन्हें सहज ही
लुटा गयी 
करूणामय मुस्कान तुम्हारी
 
 
विस्तार का कोइ सूत्र नहीं
आनंद उद्गम के लिए
हो नहीं सकता
कोइ निश्चित समीकरण
 
यह जो
नित्य नूतन सम्बन्ध है
मेरा तुमसे
इस सम्बन्ध के इतिहास में
या इसके भविष्य में नहीं
 
इसके वर्तमान में
 रस आने लगा है अब
दिख रहा है 
अपनी सम्पूर्ण आभा के साथ जीवन

इसे परिभाषित नहीं करना
बस हो रहना है
तन्मय
और
यूं ही स्थिर गतिमान
जब तक भी हो पाए ऐसा
होने ना होने से परे का होना
 
 
 
अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
२५ नवम्बर २०११        

Thursday, November 24, 2011

मंगल मुस्कान


उसने खींच कर
इतनी फैला दी मेरी बाहें
की
धरती के इस छोर से उस छोर तक
नाप लिया मैंने
एक क्षण में
सारा संसार
 
'अब कहो?'
प्रश्न उसका
मुस्कान भरा
छुड़ा रहा था
वो सब बंधन
जिनकी शिकायत से पुता मन लेकर
पहुंचा था उसके पास
 
मुक्ति के साथ
उपहार में
सहज चली आई 
निर्भयता, उदारता
और
अपार सहनशक्ति
 
मैंने उसे जब कृतज्ञता के साथ देखा
मुस्कुरा कर
उसने दे दिया सूत्र
इतने दुर्लभ उपहार को सहेज कर रखने का
 
'अभ्यास'
करते रहना
इसी तरह
साँसों के दोनों छोरों को
छूकर 
अपनी गरिमा को पहचानते रहने का 'अभ्यास'
 
और फिर
उसके साथ
मौन नदी के किनारे
बैठे बैठे
न जाने कितने युग बीते
निश्चल रह कर भी
अपने कई रूपों को
खेलते हुए देखता रहा हूँ
न जाने कितनी शताब्दियों से
 
जब जब खेलते खेलते थक जाता हूँ
इस नदी के तट पर सुस्ताता हूँ
स्वयं को अपने साक्षी रूप की याद दिलाता हूँ
और बस, दूर दूर तक मंगल मुस्कान लुटाता हूँ
 
 
अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
                      २४ नवम्बर 2011                       

Wednesday, November 23, 2011

जिसकी महिमा से सब हलचल है

 
इस बार जब सूरज निकला
और वह मुस्कुराया
किरणों के साथ गुनगुनाया
तो वह जानता था
किरणों के उजलेपन में
प्रसरण के साथ साथ 
संकुचन को स्वीकारने की ताकत भी शामिल है
 
इस बार जब उसने
खिलते फूल की पंखुरियों से झरते
आनंद के रस का स्वाद लिया
प्रसन्नता के गीतों संग
थिरकती पवन का मस्ती के साथ अभिवादन किया
उसे स्मरण था
जहाँ से आनंद झरता है
वो पांखुरी भी झड जाने वाली है
और वो जानता था
प्रसन्नता की सौरभ लुटाती पवन
सदा ऐसे ही नहीं रहने वाली है
 
 
इस बार
उसने तय कर लिया था
जो जैसा है
उसे वैसे अपनाना है
अपनी तरफ से
अपेक्षा का लबादा 
नहीं ओढ़ाना है
 
अपनी परम मुक्ति की समझ को
हथेली पर बुलबुले की तरह सजाये
जब वो पर्वत शिखर की और बढ़ रहा था
इस बार
वो जानता था
उससे परे कुछ है
जो सुकोमल सतह को
वज्र बना सकता है
और किसी वज्र को
नैनों की आंच से ही पिघला सकता है


इस बार
जब सूरज निकला तो
किरणों के साथ साथ
उसने स्मरण रखा
कुछ है किरणों के परे
जिसकी महिमा का उदघाटन करने ही
निकलता है दिन
 
इस बार
वो सजगता से
सबके साथ
हर हलचल में
उसकी महिमा गा लेने में
तन्मय हो जाना चाहता था
जिसकी महिमा से सब हलचल है


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
२३ नवम्बर २०११  
 
     
     

Tuesday, November 22, 2011

जो हमेशा एकाकी रहता है


उस दिन 
वो न नहाया
न उसने दाढ़ी बनाई
न सूरज को अर्ध्य दिया
और मंदिर की सीढ़ियों को
दूर से देखते हुए
एक पेड़ के सहारे बैठ गया
अपने आप में गुम
 
उस दिन
वो नहीं चाहता था
ईश्वर के पास जाना
आरती के समय घंटा बजाना
और
अपने अदृश्य सौभाग्य पर इठलाना
 
 
उस दिन
न जाने क्यूं
सारे नियम छोड़ कर
वो मुक्ति के द्वार को थपथपा लेना चाहता था
अपने सहज प्रवाह में
 
पूरी उदासी और पूरे अज्ञान के साथ
 
उस दिन
वो नदी के तट पर
अकेला आंसू बहता रहा
ना जाने किस बात पर
और
उसे अच्छा लगा
कोइ उसके आंसू पूंछने नहीं आया उसके पास
न किसी ने उससे रोने का कारण पूछा
 
इस बार
सब प्रयास छोड़ कर
बिना किसी पतवार के
बैठ कर नाव में
जब चल निकला वो
पूरी तरह
धारा को समर्पित होकर
इस किनारे तक लौटने की आश्वस्ति
नहीं थी उसमें
 
पर एक उत्कंठा थी
सांचे के पार
अपना अस्त्तित्व देख लेने की
 
फिर
न जाने कैसे
एक पल
छीन ले गया उससे
दिन भर का खोयापन
न जाने कहाँ से
फिर भर गया उत्साह उसमें
मंदिर के घंटों की आवाज़ ने
फिर खींच लिया उसे
या शायद
खिंचाव में
अपने होने का अर्थ ढूंढ लेने के क्रम को अपनाने का भाव
फिर से जाग्रत हो गया था उसमें
 
 
इस बार वो पहले से अधिक शांत था
उसके मौन में अब भी बहुत कुछ अनगढ़ था
पर अब अपने अकेलेपन में 
दिख रहा था उसे
विस्तार उस आकाश का
जो हमेशा एकाकी रहता है
पर किसी से अपने अकेलेपन की व्यथा
नहीं कहता है
 
 
 
अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
२२ नवम्बर २०११      
         
      

Monday, November 21, 2011

प्रकट होने से पहले

 
नहीं!
इस तरह बुलाने पर नहीं आता वह
बुला कर यह जताने का भाव
की मेरे बुलाने से आता है वह
दिख जाता है उसे
प्रकट होने से पहले
और 
वह अहंकार की ओट में छुप कर
निकल जाता है
हमारे आस-पास से
बिना अपने को प्रकट किये
 
इस तरह बुला कर
उसके आ जाने पर भी
न हम उसे पहचान पाते हैं
न उससे जुड़ पाते हैं
 
बुलाना तो ऐसे
की जैसे
पुकार के साथ
हमारा 'स्व' पिघल कर बहे
और
इस तरह 'एक मेक' हो जाए उससे
की 
बुलाने और आने में
भेद ही ना रहे कोइ
 
बुलाना दरअसल
बुलाना नहीं 
वह ही हो जाना है
ये जीवन
        जिसके बुलाने का बहाना है      
 
 
अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
२१ नवम्बर २०११          

Sunday, November 20, 2011

विराट-मिलन का उत्सव

(चित्र- गीता सेतिया)

कविता कहाँ से आती है
कहाँ छुप जाती है

कभी दिखती नहीं खुले मैदान में
कभी घुस आती है बंद मकान में

कभी सूरज की किरणों की बात बताती है
कभी चांदनी की शिकायत कर इठलाती है


कविता न जाने 
किस जन्म की साथी है
जन्म मृत्यु से परे की
बात भी सुनाती है

कभी कभी इतना आश्वस्त कर जाती है
शाश्वत की पदचाप ह्रदय में उभर आती है

और वो क्षितिज से मुझे देख कर हाथ हिलाती है
ना जाने कैसे, रोम रोम में कविता खिलखिलाती है

कविता 
ना जाने कहाँ से आती है
कहाँ छुप जाती है
ये अबूझ पहेली भी लुभाती है 
धन्य हूँ इस बात से
कि अपना समझती है मुझे
तभी तो जब जी चाहे
चली आती है
लो
अर्थ ढूँढने की आदत छुड़ा कर जब
कविता फिर मुझे इधर उधर भगाती है
ना जाने कैसे, सशक्त श्वेत पंखो की उड़ान
मेरी धडकनों को मिल जाती है
कौन सुनाये इस अनुभव का आँखों देखा हाल
जब कविता विराट-मिलन का उत्सव मनाती है
 
अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
२० नवम्बर 2011   


Saturday, November 19, 2011

छायाओं के आकार







 
किसी के अद्रश्य हाथों ने
भर दिया
कमरे में 
झकाझक उजाला,
सज गयी
इस क्षण के गले में
आस की जयमाला
  
 

कमरे के केंद्र में बैठ मैं
छायाओं के आकार बनाते
इस सौम्य उजाले के
मौन खेल देख कर
मुस्कुराता हूँ
और
एक अद्रश्य उपस्थिति को
गले लगाने
अपनी बाहें फैलाता हूँ 
 
 
 
अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
१९ नवम्बर 2011           

Friday, November 18, 2011

जय जय जीवन, जय जय जीवन

(पूज्य स्वामी श्री ईश्वारानंद गिरिजी महाराज, जिनके वचनों पर मनन ही इस कविता का मुख्य आधार है)

जय जय जीवन, जय जय जीवन
जय ये सांसों का आवागमन
ये कौन रचे अनुभव आँगन
उसकी महिमा का अभिनन्दन

जय जय जीवन, जय जय जीवन
जय सहज, सुकोमल अपनापन
ये कौन रचे सम्बन्ध सघन
उसकी महिमा का नित वंदन

जय जय जीवन, जय जय जीवन
जय सृजनशील यह स्पंदन
ये कौन रचे उन्नत चिंतन
उसकी महिमा को नित्य नमन

जय जय जीवन, जय जय जीवन
जय शुद्ध प्रेम का यह सावन
ये कौन रचे विस्मय का धन
उसकी महिमा का आलिंगन

जय जय जीवन, जय जय जीवन
जय जय जीवन, जय जय जीवन  

तुम अमर प्रेम के सहचर हो
तुम कैसा अनुपम सा वर हो
बन कर मेरी पहचान गति 
यूँ लगता, मुझ से नश्वर हो

जय जय जीवन, जय जय जीवन

अब मेरा मौन कर दो सुन्दर
अब अमृत की है प्यास मुखर
इन सीमाओं को हटा भी दो
मैं उद्गम दरसन को तत्पर

जय जय जीवन, जय जय जीवन
जय जय जीवन, जय जय जीवन

ओ काल सखा! ओ चतुर चपल
अब छोडो भी अपना यह छल
दिखला दो अपना परम भाव
तुम भी निश्छल, मैं भी निश्छल

जय जय जीवन, जय जय जीवन
जय जय जीवन, जय जय जीवन

पग पग पर तेरा आराधन
हर सांस, कृपा का है सिंचन
मैं धन्य तुम्हारे होने से
सारा वैभव तुमको अर्पण

जय जय जीवन, जय जय जीवन
अब मृत्युंजय में नित्य रमण

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
१८ नवम्बर 2011        

   
         

Thursday, November 17, 2011

रंगत है उसकी किरणों में


धरा आरती की थाली  है
हर एक सांस में दीवाली है

जहाँ जहाँ तक देखा तुमको
वहां वहां तक हरियाली है

जहाँ नहीं छू पाया तुमसे 
वही जगह अब तक काली है

 सुन्दर कर देती है सब कुछ
अद्भुत यादों की लाली है

 आनंद झरता एक बात से
वही बात कहने वाली है

रंगत है उसकी किरणों में
नित उजला मेरा माली है

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
17 नवम्बर २०११   


   

Wednesday, November 16, 2011

फुरसत का उपहार



अब वह क्षण नहीं
जब 
गुजरती है
धडधडाती रेल
संवेदना की पटरी पर
और
फेंक देती है
ताज़े अखबार की तरह
एक नई कविता मेरे आँगन में
 
जिसे उठा कर 
तुरंत सहेजना होता है
संभाल कर
धडकनों के सुर सुना कर
जतलाना होता है
उतना अपनापन
की
अपनी यात्रा की स्मृतियों छोड़
मेरा हिस्सा हो जाए कविता
 
अब 
संवेदना की पटरी
छुप गयी है
दिन की आपा-धापी में
अब
निकलना होगा दिन
सुबह की चाय के स्वाद बिना
 
आने वाले सूरज से
इस बार
बस फुरसत का उपहार मंगवाया है
समय की ऐसी खिड़की
की
तसल्ली से
उन सबसे मिल सकूं
जिनसे मिलने के पहले
जरूरी होता है 
खुद से मिल कर रहना       


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
१६ नवम्बर २०११  

Tuesday, November 15, 2011

उसके देखने मात्र से


देख-सुन कर
सीखा था
मटकी उठाना
पगडंडी पर समूह में चलना
कुछ कुछ बतियाना
कुछ कुछ खिलखिलाना
और
पनघट पर सुस्ताना
फिर
छलछलाते जल से
जीवन की झंकार सुनते हुए
धीरे धीरे घर लौट आना
कितना तृप्तिदायक अनुभव था
माथे पर मटकी धरे
धीरे धीरे
सारे घर के लिए
धरती की कोख से 
जीवन की रसमयता का उपहार लेकर आना
और उस दिन
जब पहली बार
एक कंकर ने
अचानक तोड़ डाला मेरी मटकिया को
कनखियों से देख लिया था
मोर मुकुट वाले सांवरे को
और तब
मेरे तन को
जल से तर-बतर तन को
कुछ और भी छू गया था
तृप्ति से भी बड़ी तृप्ति देता 
किसी की आँख का स्पर्श
पर ये न मालूम था
की
जन्म-जन्मातर तक
सुरभित रहेगा
साँसों में भाव
उस स्मृति का
जब
टूटने और भीगने के साथ-साथ
छूटने का और मुक्त होने के आनंद को भी
जान लिया था सहसा 
और यह सीख किसी के कहने से नहीं
बस उसके देखने मात्र से मिल गयी थी मुझे
जैसे
शाश्वत दर्पण में मिल जाए
किसी को 
अमिट चेहरा अपना
अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
15 नवम्बर 2011      

Monday, November 14, 2011

रुकना चुक जाना है

(बाबा सत्य नारायण मौर्य द्वारा बनाये गए चित्र की फोटो)

सरल बात कर, सरस साथ कर
छोड़ निशा को, अब प्रभात कर
 
 
अच्छा होने की जिद भी बढ़ा देती है बुराई
सत्य से अधिक लुभा देती उसकी परछाई
 
 

बड़े शहर में छोटी बातों का सुख खो जाता है
अपने लिए भी आदमी पराया हो जाता है
 
एक पल सहसा घेर लेती है
सारे ज़माने की चुप्पी
जब मुझे
 
दिखाई दे जाते हैं
जाने अनजाने चेहरे 
इतने सारे
 
और फिर
सबके साथ मिल कर
करता हूँ प्रार्थना
गति के लिए
 
रुके रुके भी
होता तो होगा जीवन
पर
न जाने क्यूं
चले बिना चैन आता नहीं
कहीं न कहीं 
यूँ लगता है
रुकना चुक जाना है
और
शेष होने को तैयार नहीं अभी तक
 
गति का गान फिर लहलहाया है
एक नया सपना देहरी तक आया है
और इस नई थपथपाहट के बहाने
मैंने चुप्पी के महफ़िल को मिटाया है
 
 
 
अशोक व्यास
सोमवार, 
१४ नवम्बर २०११   
     
 
 
 
    

Sunday, November 13, 2011

आनंद का ये स्वाद कहाँ से आता है


 
आनंद का ये स्वाद कहाँ से आता है
अनुभूति में उतरे किसकी गाथा है
असर बाद में होता उसकी बातों का
अर्थ खोल कर शब्द कहीं उड़ जाता है
 
 
सहज प्रेम की नदिया कौन बहाता है
करूणा से  ये कौन मुझे छू जाता है
मंगल गान गुंजरित होता साँसों में
व्योम तनु जब अंतस में मुस्काता है
 
 
ये भाव नाम के पार मुझे ले जाता है
ह्रदय मधुर ठंडक से भर भर जाता है
नाम रूप से परे भी सत्ता है उसकी
रचा-बसा जो मुझमें, मुझे रचाता है


चलो, चलो, वो स्वयं बुलाने आता है
मैय्या बन कर निद्रा दूर भगाता है
कैसे समझूं क्या मंशा आखिर उसकी
जगा रहा है वही जो मुझे सुलाता है
 
अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
रविवार, १३ नवम्बर २०११   




Saturday, November 12, 2011

आँख मूँद कर साथ निभाना अच्छा लगता है

आँख मूँद कर साथ निभाना अच्छा लगता है
जिसका सब, उसका हो जाना अच्छा लगता है

कभी छोड़ कर जिसको, जाने की चाहत जागी
आज देखिये, वही ज़माना अच्छा लगता है

मैं अपनी चुप्पी में किस्से बुनता रहता था
अब किस्सों को चुप कर पाना अच्छा लगता है 

सपनो की आहट सुन कर फिर सोने का नाटक
सच का खेल जान ना पाना अच्छा लगता है 

जिसकी याद सुनहरे रस्ते दिखलाती जाए
मेरे नाम उसका ख़त आना अच्छा लगता है

एक तलाश सी साथ चले है यूँ तो हर रस्ते
मगर ठहर कर गुम हो जाना अच्छा लगता है

नया नया लगता है जिसके छूने से सब कुछ
अब भी वो एक दोस्त पुराना अच्छा लगता है

वाह वाह करते हैं जिसके आने पर सब लोग
उसको अपने गले लगाना अच्छा लगता है

उसकी हर एक बात मुझे रोशन कर जाती है
जान बूझ कर सब दोहराना अच्छा लगता है
अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
शनिवार, १२ नवम्बर 2011   


Friday, November 11, 2011

अनंत की कविता






आज मैं कविता नहीं लिख रहा हूँ
यूं कविता मैं कभी लिखता नहीं
हर दिन
कविता की संगत में
स्वयं को नए रूप में लिखने का
विनम्र प्रयास करता हूँ



शब्द
कभी
गुफा से निकलते सूरज की तरह
चकाचौंध कर देते हैं मुझे

उनकी आभा में नहाता
मैं
अपनी चुप्पी में
भर लेता हूँ
कविता का वह स्पर्श
जिससे
सुनहरा हो जाता मेरा सारा दिन



आज कविता नहीं
स्वयं को ही लिखना है
शुद्ध रूप से
ऐसे जैसे की
रेतीले टीले पर
कंघी करती हुई
निकल जाए सरसराती हवा

जैसे
पानी को गुदगुदा कर
खिलखिलाए हवा

तरंगों की गति में
छुपे हुए
अज्ञात को
देख लेने
आज फिर
शिखर से
क्षितिज को निहारता

मैं
अनंत की कविता में लीन
शब्द गंगा में घुल कर
निःशेष हो जाने की
प्रसन्नता से
झिलमिला रहा हूँ जब

इस आनंद को आधार देते
तुम
क्या अब भी समझते हो
छुपे हुए हो मुझसे?


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
११ नवम्बर 2011         

Thursday, November 10, 2011

जिससे सुरभित हैं शब्द












शब्द नहीं
सौरभ है
अक्षरों के बीच
उपस्थिति उसकी
     जगा रही है 
भाव एक अनूठा
आकर्षण में खिंचाव नहीं
लगाव है 
एक समयातीत
मौन में
इस बार 
यूँ खोल दिया उसने
विस्तार अपना
जैसे
लौट आया हो
अपने ही घर में
माधुर्य गुंजरित है
कण कण में
यह जो रसीला
इसका आस्वादन करने
कौन किसे बुलाये
सहज है
आना-जाना
ठहरना और ठहरे ठहरे
उस गति के साथ एक मेक हो जाना
जिससे 
सुरभित हैं शब्द
और
हर अक्षर के बीच से
झांकती है सारी सृष्टि
अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
          १० नवम्बर 2011             

Wednesday, November 9, 2011

इस अज्ञात स्थल पर


यह जो बीच का क्षेत्र है
शांति और अशांति के बीच
सृजन और विध्वंश के बीच
स्वयं को पाने और खोने के बीच

यहाँ
इस अज्ञात स्थल पर
बैठ कर
देख रहा हूँ 
दुनियां के दो चेहरे
जिनमें मेरे कई चेहरे झिलमिलाते हैं

अपने आप से किये गए
सच्चे-झूठे वादों को छोड़ कर
यहीं से
लगा ली है 
छलांग
अनंत की गोद में

सब कुछ छोड़ कर
सब कुछ लेकर

इस क्षण 
यह 
जो 'शून्य' हुआ हूँ मैं
इसमें भी
शेष है
स्पर्श पूर्णता के आलोक का

इस स्पर्श से
संभव है
फिर जाग जाए
वह संसार
जिसकी कल्पना धमकती रही 
मेरी धमनियों में



अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
८ नवम्बर 2011       
   

Tuesday, November 8, 2011

इस चुप्पी का संकोच


इस बार भी
दिख तो नहीं रहा था रास्ता
पर किसी ने मिटा दिया था
अनिश्चय क़दमों का

न जाने कैसे
आश्वस्ति हो चली थी सहचरी
की
गिरना तो नहीं है
बढ़ना तो है ही

अँधेरे में भी
जाग्रत है निरंतर 
एक वह
मुझे हर चोट से
बचाने के लिए


इस बार भी
कहने को कुछ नहीं था
बस एक चुप्पी थी
पर किसी ने
मिटा दिया था
इस चुप्पी का संकोच

सुदामा की तरह
छुपा कर नहीं रखा
अपना शब्दहीन होने का भाव
ज्यों को त्यों
दे दिया उसे
अपना सीमित आकर

और फिर ऐसे मुस्कुराया निराकार
की सभी अवरोधों के साथ भी
लम्बा सा रास्ता
सहज ही हो गया पार



अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
                     

Sunday, November 6, 2011

एकाकीपन लेकर ही संगम आया



फिर तुझको ख़त लिखने का मौसम आया
पर कागज़ लफ़्ज़ों से हरदम कम पाया 

उसके आँखों के रस्ते में फिसलन थी 
चोट लगी थी जहाँ, वहीं मरहम पाया

याद जगा कर, सोने की मोहलत माँगी
सपनो में भी जो पाया, कम कम पाया 

टकराने के बाद हुआ अक्सर ऐसा
एकाकीपन लेकर ही संगम आया

बात तुम्हारी तुमसे कहने बैठा था
ना जाने, आँखों को क्यों कर नम पाया


अब आँगन में कोई चिड़िया नहीं रही
ये बहेलिया काल, गज़ब सरगम लाया


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका 
६ नवम्बर २०११





 
 


     

Wednesday, November 2, 2011

एक नई सुबह का इंतज़ार


सुबह के आने से पहले
तैयार है
फरमाईशों की नई फेहरिस्त

ये करना है
वो कहना है
ये सूचना लेनी है
वो सूचना देनी है
यहाँ जाना है
वहां जाना है
उससे मिलना है
उसे वो बताना है


सुबह के आने से पहले
इतने पैबंद लगा लिए हैं
अपने ऊपर
चिंताओं के
चुनौतियों के
और
दे दिए है
आने से पहले ही
इतने सारे पलों को उधार
की
अब
पता भी न चलेगा
सुबह कब आई
क्या साथ लाई
और ये भी न जान सकूंगा 
की
कब मुझे छोड़ कर चली गयी सुबह
एक नई सुबह का इंतज़ार करने



अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
२ नवम्बर २०११               

Tuesday, November 1, 2011

एकाकी मौन


 1
उसने सुबह सुबह
किरणों से दोस्ती कर
ताज़ा गुलाब जब पेश किया
सूरज को

सूरज ने मुस्कुरा कर
लौटा दिए
सहस्त्र कमल
उसके मानस में


खिले कमल सा
प्रफुल्लित मन लेकर
गुरु गान करता
वह निकला
जिन जिन गलियों से
स्रवित हुआ अमृत
हर घर की देहरी से


विस्तार इतना 
जो दीखता रहा उसे
छुपा था
उसकी आँखों में
कहते रहे लोग उसे
और वह 
स्वतः स्फूर्त आविष्कार के लिए
सराहित होता
एकाकी मौन की शरण लेने
प्रविष्ट हो गया
अरण्य में
अनायास फिर से



अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका

१ नवम्बर २०११                 

आनंदित निर्झर

छम छम बरसे प्रेमामृत सा खिला करूण अलोक अपरिमित मौन मधुर झीना झीना सा सरस सूक्ष्म  आनंदित निर्झर तन्मय बेसुध  लीन....  ...