Wednesday, November 9, 2011

इस अज्ञात स्थल पर


यह जो बीच का क्षेत्र है
शांति और अशांति के बीच
सृजन और विध्वंश के बीच
स्वयं को पाने और खोने के बीच

यहाँ
इस अज्ञात स्थल पर
बैठ कर
देख रहा हूँ 
दुनियां के दो चेहरे
जिनमें मेरे कई चेहरे झिलमिलाते हैं

अपने आप से किये गए
सच्चे-झूठे वादों को छोड़ कर
यहीं से
लगा ली है 
छलांग
अनंत की गोद में

सब कुछ छोड़ कर
सब कुछ लेकर

इस क्षण 
यह 
जो 'शून्य' हुआ हूँ मैं
इसमें भी
शेष है
स्पर्श पूर्णता के आलोक का

इस स्पर्श से
संभव है
फिर जाग जाए
वह संसार
जिसकी कल्पना धमकती रही 
मेरी धमनियों में



अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
८ नवम्बर 2011       
   

2 comments:

प्रवीण पाण्डेय said...

बहुत ही सुन्दर।

Rakesh Kumar said...

अपने आप से किये गए
सच्चे-झूठे वादों को छोड़ कर
यहीं से
लगा ली है
छलांग
अनंत की गोद में

अभूतपूर्व छलांग है आपकी.
अनन्त की गोद ही तो सर्वोच्च है.

मेरी भी सुनवाई हो,अशोक जी.

वहाँ जो मौन है सुंदर

वह जो लिखता लिखाता है कहाँ से हमारे भीतर आता है कभी अपना चेहरा बनाता कभी अपना चेहरा छुपाता है वह जो है शक्ति प्रदाता  ...