Wednesday, November 16, 2011

फुरसत का उपहार



अब वह क्षण नहीं
जब 
गुजरती है
धडधडाती रेल
संवेदना की पटरी पर
और
फेंक देती है
ताज़े अखबार की तरह
एक नई कविता मेरे आँगन में
 
जिसे उठा कर 
तुरंत सहेजना होता है
संभाल कर
धडकनों के सुर सुना कर
जतलाना होता है
उतना अपनापन
की
अपनी यात्रा की स्मृतियों छोड़
मेरा हिस्सा हो जाए कविता
 
अब 
संवेदना की पटरी
छुप गयी है
दिन की आपा-धापी में
अब
निकलना होगा दिन
सुबह की चाय के स्वाद बिना
 
आने वाले सूरज से
इस बार
बस फुरसत का उपहार मंगवाया है
समय की ऐसी खिड़की
की
तसल्ली से
उन सबसे मिल सकूं
जिनसे मिलने के पहले
जरूरी होता है 
खुद से मिल कर रहना       


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
१६ नवम्बर २०११  

1 comment:

प्रवीण पाण्डेय said...

जब पुल से निकलकर ट्रेन पुनः जमीन पर आती है तो सुखद अनुभव होता है।

आनंदित निर्झर

छम छम बरसे प्रेमामृत सा खिला करूण अलोक अपरिमित मौन मधुर झीना झीना सा सरस सूक्ष्म  आनंदित निर्झर तन्मय बेसुध  लीन....  ...