Sunday, November 27, 2011

अनंत के आँगन में

नरम घास की नोक से
ओस की बूँद
अपने ह्रदय पर लगा कर
शीतलता का नया श्रृंगार कर
उसे लगा
आकाश मुस्कुराया
और
उसके चेहरे पर
परिधियों की पहचान नकारती मुस्कान
उमड़ आई
कुछ ऐसे
जैसे
छिटक गया हो
सूरज का उजाला
चारों दिशाओं में
 
 
 
उड़ती चिड़िया 
उड़ते उड़ते
किसी निश्छल, तृप्त क्षण में
नृत्य सा 
करती है
गगन मंच पर जैसे
 
पवन के आलिंगन से
झूम झूम
अपनी कृतकृत्यता गाती हैं
जैसे फ़ैली हुई शाखाएं
 
या फिर
नन्हा बालक
अपनी ही मस्ती में
रच लेता है
खेल संसार
और
परिचित वस्तुओं में
उद्घाटित कर देता है
एक नया आयाम
 
कुछ ऐसे ही
अपनी वस्त्र भीगने से बचाती
धीरे धीरे पग धरती
सुन्दरी की तरह
पार कर 
बरसाती नदी
 
उसके मन ने
लांघ कर सीमाबद्ध सन्दर्भ
अनंत के आँगन में
कुछ देर के लिए
छोड़ कर
अपना आकार
कर दिया उजागर 
      असीम आनंद          
 
 
अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
२७ नवम्बर २०११   
         

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