Thursday, June 30, 2011

अव्यक्त आनंद का सूत्र





यह झकाझक उजाला
प्रसन्नता की किलकारियां 
खिलकाती किरणें
फ़ैल कर खो बैठी हैं
अपना मूल स्वरुप

पर मिलने-जुलने में
खोकर
अपना सर्वस्व बाँट लेने की उदारता में
याद ही नहीं इन्हें
की क्या खोया है
शायद यह बोध भी न हो
की क्या पाया है

खोने और पाने से परे
अव्यक्त आनंद का सूत्र बन जाना
किरणों को किसने सिखाया है?


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
       गुरुवार, ३० जून २०११          
     

Wednesday, June 29, 2011

लहरों का घर


उदगम
प्रवाह
गति
लय
अनुबंध
प्रबंध
उल्लास
विश्वास
महारास


पोंछ कर
दिन-रात का अंतर
साँसों में
मुस्कुराये शिव शंकर
खोने पाने से परे
गूँज उठा
अक्षय तृप्ति का स्वर


सार
उजियारा
विस्तार
अमृत
आत्मीय पगडण्डी
पीपल की छाँव
विश्रांति
विराम
खुल गया
पूर्णता का पैगाम


अभी दृश्यमान
अभी ओझल
कौन नहीं है
चंचल

किनारे के मोह में
खुला नहीं लंगर
देख नहीं पाए
लहरों का घर

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका 
                         २९ जून २०११                                    

Tuesday, June 28, 2011

व्योम तन लेकर


यह कैसे
सहसा 
अपनी बाँहों में भर कर
उजियारे का शीतल स्पर्श
उंडेल कर मेरी साँसों में

खोल कर अवगुंठन 

शिखर की ओर
लिए चलते हो
तुम मुझे
मुझ से भी मुक्त कर

विस्तार, उल्लास, 
अनिर्वचनीय शांति का
मद्धम गतिमान झरना सा

प्रसन्नता के नए पुष्प जो
खिल गए हैं
धरा के इस छोर से
उस छोर तक

इन सबको
तुम्हें अर्पित करने की चाह लिए

मैं विलीन क्षितिज में
मुस्कुरा रहा हूँ
व्योम तन लेकर


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
                  मंगलवार, २८ जून २०११            

Monday, June 27, 2011

मौन की दुर्लभ डलियाँ


जटाओं में जब 
ठहर गयी थी गंगा,
मगन अपने आप में
पशुपतिनाथ
जिस मौन का
सघन केंद्र बन
अपने आप में सम्माहित
जिस परम अनुभूति से
हृदय को
सम्पूर्ण सृष्टि का
केंद्र बना कर
बैठे थे
त्रिलोकीनाथ

उस मौन की दुर्लभ डलियाँ
शब्द गंगा रूप में
अब भी 
हो रही हैं
प्रवाहित
उतरती हैं
कृपा सिंचन करती
जब भी
 बुलाता है
भागीरथ रूप लेकर मन


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
             २७ जून २०११                

Sunday, June 26, 2011

शब्दातीत की करूणा


अब फिर से
पोंछ कर सलेट को
सोच रहा हूँ
लिख ही दूं
वह इबारत इस बार
जिसे मिटाने की
जरूरत ना रहे कभी

हाथ कांपते हैं
शब्द उतरने से पहले
जांच रहे हैं
मेरी अँगुलियों की निष्ठा

जांच रहे हैं
शेष तो नहीं
ह्रदय में कोई कोलाहल

पुकार में इस बार
जो तीव्रता है
रुलाई बन कर फूटने को है
विराट के चरणों में

पर शब्द अब तक
ठिठक कर
देख रहे हैं
मेरे भीतर
वह प्रमाण 
जो मुझे एक कर दे अमिट से

शायद मिला नहीं 
वह संकेत शब्दों को

ऐसा ही  लगता है
खाली सलेट देख कर

फिर भी
कुछ तो उतरा है
शब्दातीत मेरी साँसों में
इस क्षण 

जिसके कारण
यह अदृश्य शांति सी
बिछ गयी है

 और छू रही है
शब्दातीत की करूणा
बह निकली
गंगा जमुना मेरे नैनों से

जाग गया अंतस में
पवित्रता का रसमय स्पर्श



अशोक व्यास
२६ जून २०११ 
               

Saturday, June 25, 2011

बहती नदी के किनारे



जो कुछ साथ लाया था
सब छोड़ दिया है 
तट पर
नदी में उतरने से पहले
यह याद भी नहीं की मुझे तैरना आता है या नहीं
कुछ दूर उतरने के बाद
ये पता चल जाता है की
मुझे डूबना भी नहीं आता


सुरक्षित रहने की चाह
मेरे भीतर रख कर
दिन-प्रतिदिन
मेरे आस पास
असुरक्षा के संकेत बढाने वाले
तुम मुझे जो कुछ सिखाना चाहते हो
उसके लिए
क्या जरूरी था
इतनी गहराई
इतनी ऊँचाई
इतने कांटो पर से मुझे चलाना

देखो, शिकायत न समझना मेरी इसे
पर
यह सब जो
उत्पन्न कर रहे हो मेरे चारो और
ये मनोवृत्तियां, जो तुम्हे देखने के मेरे ढंग पर अंकुश लगाती हैं

ये उथलापन, ये देह का उत्सव मनाने 
और मनमाने ढंग से जीवन को सजाने 
के नित्य नए अप्राकृतिक तरीके

मेरी धडकनों ने बरसों से
जो पाठ पढ़े हैं
उनको लेकर
अपनी अनुभूतियों तक पहुंचाने के लिए
क्या अब
गुफा में जाकर बैठ जाने के अलावा
कोई चारा नहीं है

हे कृष्ण
क्या एक साथ 
कई कई संसार बना कर
तुम ये चाहते हो
की हम अपने संसार में रहते हुए
दुसरे संसार से पूरी तरह विलग रहें
क्या इसी को तुम 'अनासक्त' होना कहते हो

थक कर
बहती नदी के किनारे
प्रणाम कर रहा हूँ जब सूरज को
बात तुम से ही कर रहा हूँ केशव
मेरी छोडो
अब तुम्हारे लिए भी
अधिक चुनौतीपूर्ण हो गया है क्या
हमें उबारना

या फिर
तुम्हें जानने के मेरा प्रयास को
बड़ी लम्बी यात्रा तय करनी है
अब तक

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
२५ जून २०११  
 
                    

Friday, June 24, 2011

अभिव्यक्ति का दूध


कौन सा होगा वह शब्द
जहाँ से शुरू होगा
सूत्र
अपने आप तक पहुँचने का

प्रश्न दिखता नहीं
उत्तर दिख जाता है
खुले द्वार को देख दौड़ता है मन

अभिव्यक्ति का दूध
झरता है जैसे
पावन गौमाता के थन से

शब्द वात्सल्य से
उंडेलते हैं
शुद्धि, बुद्धि
दृष्टि और फिर
और अधिक सुन्दर, रसमय
सारयुक्त हो जाती सृष्टि


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
२४ जून २०११              

Thursday, June 23, 2011

मेरे हाथ की रेखाएं


आज सुबह की हवा से
छान-छान कर
अपनी हथेली पर
धर रहा हूँ
तुम्हारी वो बात
जिसे लेकर
तुमने साँसों को अपनाया
जिसे सहेज कर
स्वर्णिम सुर खनकाती रहीं 
तुम्हारी धड़कने

जिसे सुनाने तुम
 कितनी ही सभाओं में जा-जाकर
लोगों को
 उनकी ही शक्ति का
स्मरण करवाते रहे

वो बात
जो अब तक
मैंने खिड़की मैं बैठ कर
किसी जुलूस की तरह देखी

वो बात
जो सुन कर
अपना लेने की मुंदरी-मुंदरी चाह जगी
पर 
जिसे अपनाने के लिए
छोड़ नहीं पाया मैं
अपने छोटे छोटे खेल

आज सुबह की पवन से
छान- छान कर
सहेज रहा हूँ
तुम्हारी वो बात
अपनी हथेलियों में जब
देखता हूँ
बदल रही हैं
मेरे हाथ की रेखाएं

तड़क कर टूट सी रही है
मोह की एक तंग कोठारी
जिसमें रहते रहते
तुम्हारी उड़ान देख देख कर
मुग्ध होती रही मेरी चेतना

तो क्या आज ही वह दिन है
जब 
मुझे वह होना है
जो होने के बाद
मिट सा जाएगा
मेरे और तुम्हारा भेद


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
                      २३ जून २०११                       

Wednesday, June 22, 2011

अनंत का आस्वादन


तब 
जब
निर्भर हो जाता है
प्यार का प्रवाह
इस-उस घटना पर
नियंत्रित हो जाता है आत्मीय स्पर्श
अनुकूलता और प्रतिकूलता के बीच

तब
सिमट जाता है
 सहज स्फूर्त सौंदर्य
सिमटा सिमटा अपने आप में
संकुचित हो जाता है मेरा संसार

सूख जाता है जुड़ाव
अपेक्षा के दंश से ग्रस्त
अपने अमृत कलश से दूर
एक विष बना कर
स्वयं को कलुषित करता
मैं
तड़पता, छटपटाता, कसमसाता

अपने इस घेरे से मुक्त होने
तुम्हें ऐसे पुकारता हूँ
जैसे मृत्यु की तरफ जाता  जाता
मगर के मुहँ में फंसा गजराज पुकारे

और
महिमा है तुम्हारी
ना जाने कैसे, कहाँ से मुस्कुरा कर
फिर मुक्त कर मुझे
खोल देते हो 
प्रेम का निष्कलंकित, स्व-निर्भर 
निर्मल, स्वच्छ, पावन प्रवाह

इस तरह
अनंत का आस्वादन करने की मेरी पात्रता
फिर से मुझे सुलभ करवा कर
तुम तो नहीं मांगते मुझसे कुछ
पर
मैं कृतज्ञता के साथ साथ
अपनी सुरक्षा के लिए भी
स्वयं को सौंप देना चाहता हूँ
पूरी तरह तुम्हें


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
२२ जून २०११    
               

Tuesday, June 21, 2011

कृतज्ञता पुष्प अर्पित करने


तुम कितना कुछ देख, सुन, समझ चुके हो
कितनी चोटियाँ अनुभूति की
छू चुके हैं 
तुम्हारे चरण

विस्मय इस बात का
की इतने विस्तार को पचा कर
सहजता से
हमारी गली में आकर
 
तुमने हमारे मेंढक से मन को
फुदकना छोड़ कर
उड़ने का आव्हान किया

तुम्हें आस्था है
हमारे पंखों में
तुम्हारी आश्वस्ति से
अनंत का एक स्पर्श
यह जो स्फूर्ति जगा देता है

इसे लेकर
तुम्हारी अगली यात्रा की बाट देखना छोड़
अखंड तक नहीं
तुम्हारे द्वार तक पहुँचने का संकल्प ले
निकल पडा हूँ

अपने पंखों का परीक्षण करने नहीं
बस तुम्हारे चरणों में
अपने कृतकृत्यता से उपजे
यह कृतज्ञता पुष्प अर्पित करने


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
             मंगलवार, २१ जून २०११              

Monday, June 20, 2011

एक सौम्य तारतम्य



उतरते हुए
छम छम करती
बूंदों की लडियां
अलग अलग होते हुए भी
जुडी हैं
एक दूसरे से
गति के द्वारा, लय के द्वारा
सौंदर्य और संगीत प्रकट करता

जुड़ाव का
एक सौम्य तारतम्य

इस जुड़ाव में
एक अदृश्य सूत्र है,

मुग्ध हो रहा
उसे देख-देख कर
जो
ना दीखते हुए भी
दिखाता है
सब कुछ

अशोक व्यास
           २० जून २०११              

पूर्णता का बोध

 
थकान  के बीच
शेष रहती है
कोमल, ताज़ी हवा
और थोड़ी सी मिटटी
जिसमें संकल्प का बीज रोप कर
देखना चाहता हूँ
तुम्हारा वो चेहरा
जिससे मिट जाता है 
अधूरापन
छलछलाता है
पूर्णता का बोध
और अमूर्त भाव में भी
आनंद का स्वाद लेता
झूम झूम जाता हूँ मैं
 
 
अशोक व्यास
१९ जून २०११
           

Saturday, June 18, 2011

तुम्हारी वो बात





अब हर दिन
हर अनुभव
प्रमाणित करता है
तुम्हारी वो बात
जो तुमने कई शताब्दियों पहले कह दी थी

वही बात
तुम्हारे सत्य में झिलमिलाती 
सूरत की किरणों में नहाती
पवन के झकोरे पर
खिलखिलाती
पत्तियों पर भी
नृत्य कर रही है

मेरे एकांत में
यह जो शाश्वत के साहचर्य की अनुभूति है

इसे पीछे भी
वही दृष्टि है
जिसे नदी- नाले
सागर- पर्वत 
कोई भी तो नहीं रोक पाया

इसकी संगत में
हर सांस के साथ
एक उत्सव सा है
जिस पूर्णता का
इसे कैसे सुरक्षित रख पाती है
तुम्हारे द्रष्टि

सोच सोच कर
मुस्कुराता हूँ
तुम्हारे दरबार में
झुक-झुक जाता हूँ

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
शनिवार, १८ जून २०११  
           

Friday, June 17, 2011

जीवन है आभार का किस्सा



जीवन मौज-बहार का किस्सा
बाकी सब बेकार का किस्सा
पतझड़ हो या हो वसंत अब
सबमें उसके सार का किस्सा

रंग-रंगीला धार का किस्सा
भीतर की बौछार का किस्सा
भीग गया जो जो भी खुल कर
जान गया आधार का किस्सा

अब कैसा अधिकार का किस्सा
छोड़ जीत और हार का किस्सा
चल अनंत से हाथ मिला कर
बदलें इस संसार का किस्सा


वही हर एक झंकार का किस्सा
सब सुमिरन के तार का किस्सा
हुआ तरंगित रोम-रोम में
एक विस्मित विस्तार का किस्सा


प्यासा रखे उधार का किस्सा
तृप्त करे उपहार का किस्सा
उग जाता है सच का सूरज
सुन अमृत-भण्डार का किस्सा


छूट गया व्यापार का किस्सा
साँसों में बस प्यार का किस्सा
दूर दूर तक देख के जाना
जीवन है आभार का किस्सा
अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
शुक्रवार, १७ जून २०११  
 

Thursday, June 16, 2011

हर एक रूठे को मना दे मौला



बैचेनी है जाने क्यूं इतनी सारी
रात हो गयी है मुझ पर कितनी भारी
वक्त पड़े क्यूं काम नहीं आती मेरे
कहाँ धरी रह जाती है सब तैय्यारी


नींद चुरा कर कौन कहाँ ले जाता है
एक अधूरा सपना सा दे जाता है
साँसों में एक राग टूटता दीखता है
बरसों के सावन को झूठ बताता है



अब जो देखा, मचान पर देखा
तीर उसका, कमान पर देखा
सिमटे मेले वो मौज -मस्ती के
सुख का ठेला, ढलान पर देखा

4

साया बरगद का घना दे मौला
अपने जैसा ही बना दे मौला
फूल ऐसे खिला दे धड़कन में
हर एक रूठे को मना दे मौला


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
गुरुवार, १६ जून 2011     
       

Wednesday, June 15, 2011

आग्रहों का बंधन


पहुँच कर
कहाँ, कितनी
देर ठहरना
इसकी समझ
अनुभव संपत्ति पर
कितना प्रभाव डालती है
इसका पता जब चल जाता है
जीवन का स्वरुप बदल जाता है


मन का मौसम हाथ तुम्हारे
पतझड़-वसंत, सब साथ तुम्हारे

तुम अनंत की दीपशिखा हो
कर लो अपने वारे-न्यारे


जीवन बंधन से नहीं
बंधन में नहीं
मुक्ति में है
विस्तार में है

आग्रहों का बंधन जो छोड़ पाया
वो विराट को भी अपनी तरफ मोड़ पाया


जो जो अपेक्षा की खींच-तान कर लेता है पार 
उसके लिए हर पल लेकर आता है मधुर बहार
जो 'होने' 'न होने' में देख पाता है सार-श्रृंगार
उसका स्मरण भी देता है आश्वस्त आधार 


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
बुधवार, १५ जून २०११  
  
            

Tuesday, June 14, 2011

विजेता वो है




नया यानि ऐसा
जो हुआ नहीं पहले
हर दिन यूँ तो
वही कुछ होता है
जो हो चुका है पहले
सूरज का उगना
नींद से जागना
इधर उधर भागना
और
उड़ती सोचों के परों को ताकना
 पर उसी कुछ के लिए
हमारी नयी  प्रतिक्रिया 
नया कर देती है सब कुछ
 
 2
 

 
सोच समझ कर
कोई प्रतिक्रिया ना करना भी
एक तरह की प्रतिक्रिया है
 
मूल प्रश्न कुछ पाने 
या कुछ खोने का नहीं
हर प्रतिक्रिया में  
स्वयं से जुड़ाव को
 बचाए रखने का है

विजेता वो है
जो स्वयम को छोड़े बिना
प्रतिक्रिया कर पाता है
क्यूंकि वो 
अपने विरोधी को
भी वैसे अपना पाता है
जैसे वो स्वयं को अपनाता है
अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
१४ जून २०११  
       

Monday, June 13, 2011

आत्म-परिचय का बोध


संवाद नदी के सूख जाने से
 घना एकांत उभर आता है   
जैसे कोई काल कोठरी में
बंदी बना जाता है  

जैसे एकाएक 
फूलों की घाटी का रास्ता 
कहीं खो जाता है

ऐसा
जैसे बारिश की बूंदों को
कोई बीच रास्ते में ही
चुराता है


इस तरह असहज 
करता अनुभव 
ये सिखाता है 
की पूर्णता का प्रतिबिम्ब
पूर्णता का पर्याय नहीं 
बन पाता है

 अपने आप पर निर्भर होकर ही
सम्पूर्णता का  वह वैभव खुल पाता है
जिसे छूकर 
अक्षय प्रीत का झरना
बह आता है

जब जब 
 आत्म-परिचय का बोध 
छूट जाता है
इस झरने का बहाव 
कोई
लूट जाता है 


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
१३ जून २०११
   

अमृतमय सरोवर की आलोकित सीढियां


सुबह सुबह
अज्ञात स्थल पर
सजे हुए ज्ञात भाव
देख कर
साँसों के सार से
दृष्टि हटने की
सम्भावना देख कर
बढ़ाना चाहता हूँ अपनी सतर्कता

क्या क्या देखना है
क्या क्या सुनना है
क्या क्या कहना है
किस किस तरह के प्रभाव से करना है श्रृंगार
और कैसे बोध को भेजते रहना है क्षुद्रता के पार

सुबह सुबह
निश्छलता से अपना सौंदर्य उंडेलने के लिए
खिलते हुए फूल की
रणनीति की तरह
दिन को
सजगता से सुरक्षित करने
देखते हूँ
विराट के संकेत
और
सहज ही
बन जाता है
समन्वय बनाता 
माधुर्य बढाता
एक तारतम्य

अपनी प्राथमिकताओं की सजावट को
छलने वाली स्थिति टल जाती है

यह क्षण
जब पूरी तरह सुरक्षित हो जाता है
अनंत की करूणा में भीग कर
खुल जाती हैं 
अमृतमय सरोवर की आलोकित सीढियां

बस यहाँ से शुरुआत है
एक नए दिन की
यह सुन्दर, सार्थक, आनंद से परिपूर्ण
अमृतमय दिन
मैं
तुम्हारे साथ बांटना चाहता हूँ
और यह चाहत भी
उसके चरणों में सौंपता हूँ
जिसके देखे से
मैं मैं बनता हूँ
और
दिन दिन बनता है

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
सोमवार, १३ जून २०११  
 

   
   

Sunday, June 12, 2011

मैं कुछ भी नहीं



पगडण्डी 
पहाड़
हरियाली
घास
बादल
चुप्पी
सांस में
बोध विस्तार का

सुन्दर विस्मय
धड़कता है


चिड़िया
स्पंदन
चमकीली अनुभूति
माधुर्य रस

एकमेक
गति-स्थिरता

मुस्कान स्पर्श सी
छू कर सबको
स्वयं अनछुई 
निश्छल, 

पूर्णता को 
विरल तरल बना
सुलभ करवाती
अति दुर्लभ


धीमे धीमे हिलते
पेड़ की चोटी पर पत्ते 

अति सुन्दर के 
आगमन की घोषणा

गीली माटी में
प्रसन्नता की पावन गंध       

न जाने कहाँ से
निकल कर
छुप गया
पेड़ों के पीछे
भागता हिरन

प्राकृतिक मौन के साथ
एकमेक
दृष्टा से चित्र
और
चित्र से दृष्टा तक की
यात्रा करता

जानने लगा हूँ
मुझमें से होकर
निकली हैं
कई कई शताब्दियाँ
मैं सबमें
मैं सब कुछ
और
मैं कुछ भी नहीं


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
          रविवार, १२ जून २०११           

     

Saturday, June 11, 2011

सत्य की वो अनवरत गाथा


कैसे तय होता है
कौन कितना कर सकता है
कितना प्रभाव हो जाए
एक मनुष्य के होने से

यदि 
स्वभाव से होता है प्रभाव
तो प्रश्न यह 
की कैसे बनता है स्वभाव
और
एक संरचना आदतों की
बन चुकी है जो
क्या बदला जा सकता है इसे
यदि हाँ
तो कैसे
किसके प्रस्ताव से
सूत्रपात होता है  
इस आन्तरिक परिवर्तन का
वह जिसे हम
इच्छा शक्ति कहते हैं
क्या एक निश्चित मात्रा में मिलती है हमें
या बढाया जा सकता है इसे

यदि हाँ
तो कैसे
कैसे हम आश्वस्त हों की
अपार शक्ति है हममें 
और
हम इसे उजागर कर सकते हैं
हम  जहां भी हैं,जैसे भी हैं
और अधिक संवर सकते हैं

परिष्कार की पुकार सुन कर
सबके लिए प्यार चुन कर

मैं
कविता के अंतिम छोर पर
जहाँ ढूंढ रहा हूँ खुदको
क्या यहाँ पर 'अनंत है'
यह विस्तार
जो सीमित नहीं है मेरे जाने पहचाने 'मैं' तक

यह मुझे जिस भाव से अपनाता है
उसमें हर दुराव-छिपाव मिट जाता है
सुनाई देती है सत्य की वो अनवरत गाथा
जो है सबके लिए, पर बिरला ही इसे सुन पाता है   

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
शनिवार, ११ जून 11 
   

Friday, June 10, 2011

त्याज्य सन्दर्भ


अब
स्तरहीनता पर
आश्चर्य नहीं होता,

दिन-दिन
बड़े पैमाने पर
त्याज्य सन्दर्भ
प्रकशित केंद्र की शोभा बन कर
छीन रहे हैं
हमारा सामूहिक ध्यान,

खुलेपन के नाम पर
बंद होते जा रहे हैं हम
जीवन की गरिमा, सौन्दर्य और
संवेदनशीलता के प्रति.

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
१० जून २०११




जो शब्द बनता है



यही तो चाह था
मेज-कुर्सी
एकांत
खाली कागज़
पेन
और
ऐसा मौन
जिसमें
आवाहित किया जा सके
उसे
जो शब्द बनता है
अर्थ बनता है
और
जोड़ कर
शब्द को अर्थ से
सार्थक कर देता है
मेरा होना

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
१० जून २०११ 

सम्भावना का खेल


होता है न
बच्चा कभी
ऐसी मनःस्थिति में
की फेंक देता है
हर खिलौना
न ये, न वो
सुहाता नहीं उसे
कोइ भी खेल
 
ऐसे अनमने बच्चे सा
गैस का गुब्बारा 
रुकती-  भागती हवा
ठुमकते - ठुमकते
लचकचाता धागा
 
दोस्त
आज फिर
सोच रहा हूँ
सीमा छोड़ देह की
अपना लूं विस्तार
मिल जाऊं कण कण में
 
नकारते हुए
हर सम्भावना का खेल
निर्वात के
आधे क्षण में
सोच रहा 
कैसे शांत हो
मन का कोलाहल
 
अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
(आज नहीं न जाने कब लिखी थी ये कविता, आज आपके पास पहुँचने का अवसर पा रही है )              

Thursday, June 9, 2011

नित्य नूतन की लय


नया और कुछ हो न हो
मैं ही होता हूँ नया
क्षण क्षण
नित्य नूतन के साथ
नए नए ढंग से जुड़ते हुए
कभी उल्लसित
कभी चिंतित 
कभी शांत 
कभी व्यग्र
कभी अपने निरंतर विस्तार की अनुभूति से आल्हादित
कभी अपने क्षुद्रता के बोध से नियंत्रित 

नया और कुछ हो न हो
मैं तो होता ही हूँ नया
हर क्षण
और नूतनता को आत्मसात करने की
मेरी लय
जब
नित्य नूतन की लय से मेल खाती है
अपने संभावित विस्तार की पराकाष्ठा का दर्शन कर
एक क्षण
अहोभाव में तिरता
 अव्यक्त आनंद के ज्वार में लीन
गति और स्थिरता का भेद भूल कर
एकमेक सा हो जाता हूँ
उसके साथ
जो पूर्ण होकर भी निरंतर नित्य नूतन है    


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
गुरुवार, ९ जून २०११          

Wednesday, June 8, 2011

मौन में अनायास


धूप का हाथ पकड़ कर
बादलों से
बाय-बाय कहता
फूलों की घाटी में
उतरता हुआ
वह
एक क्षण
पर्वतों के विस्तार को 
देख कर
हो लिया मगन
धूप-छाँव से परे के
मौन में अनायास

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
८ जून २०११           

नित्य नूतन का पता




पंछियों की चहचहाहट,
ताजगी का स्पर्श लेकर बहती
मधुर पवन,
उजियारे के पुष्प का
धीमे धीमे खिलना,

अगणित रचनाएँ कण कण में
जगा कर

आदित्य प्रकट होते हैं

अपनी महिमा और गरिमा के साथ,

अलग अलग कोण से 
हमें देखते
स्वयं को दिखाते

पूर्व से पश्चिम की ओर चलते भास्कर
हमारे लिए
खोल देते हैं 
एक नया दिन,

हर सुबह 
एक नया रिश्ता बनाती है
हमारे साथ
हर दिन होती है 
कोई न कोई
नयी बात,

कितना अच्छा है
एक जैसे नहीं होते दिन
वर्ना हम देख ही ना पाते
अनंत रश्मियों का श्रृंगार करता
यह जीवन
जो 
पाने और खोने का खेल सजा कर
इससे परे के स्थल पर ले जा कर
हमारे लिए
आन्तरिक समृद्धि का सार
खोलता है

सुबह के साथ नया सम्बन्ध बनाते बनाते
हम पा लेते हैं
नित्य नूतन का पता


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
८ जून २०११   
 



            

Tuesday, June 7, 2011

सारा संसार


सीढियां
अपने आप
आ जाती हैं
पांवों के नीचे,

चलना कर देता है 
उन्नत,

बढ़ते बढ़ते
गगन छूना 
सहज हो जाता है

मेरी मुस्कान के घेरे में
धीरे धीरे
सारा संसार
समा जाता है 

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
मंगलवार, जून ७, 2011         

मिले है तेरा ही हंसता चेहरा


कुछ लिखने की चाह से भर जाता हूँ
खाली कागज़ देख के डर जाता हूँ

न जाने हो गया क्यूं कर ऐसा
शब्द के साथ ही घर जाता हूँ

तुम्हें मालूम हो ना पायेगा
हो के अदृश्य किधर जाता हूँ

उससे बनने का हुनर सीखा है
जिसकी बातों पे बिखर जाता हूँ

मिले है तेरा ही हंसता चेहरा
लहर के साथ जिधर जाता हूँ

अब तुझे ढूँढने को ऐसा है
अपने भीतर ही उतर जाता हूँ

वो ही छलता रहा है सदियों से
जिससे मैं सच की खबर पाता हूँ

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
३ अपिर्ल २०११ को लिखी 
७ जून २०११ को लोकार्पित
  

कृतज्ञता


कृतज्ञता
 सिर्फ चोटी पर ठहरे
पेड़ के पत्तों के लिए ही नहीं
धरती में प्रविष्ट जड़ के लिए भी

कृतज्ञता पूरे पेड़ के प्रति
और उसे धारण करने वाली
पूरी धरती के प्रति

कृतज्ञता हवा के प्रति
और हवा से प्राणों का अद्भुत सम्बन्ध बना कर
मुझे जीवित रखने वाले के प्रति भी

कृतज्ञता का भाव भी
प्रार्थना की तरह धो  देता है 
मन का कलुष
मिटा देता सब शिकायतें

अभिषेक के बाद
पुरोहित द्वारा
चन्दन कुमकुम लगाने के बाद
जैसे विघ्नविनाशक की हो रही हो आरती
कुछ कुछ ऐसा ही
हो जाता है मन

सुन्दर, सौम्य, शीतल
मेरे लिए मेरा विस्तार खोल कर
अपार प्यार सुलभ करवाने की कृपा करता
मेरा मन
शायद कृतज्ञता के भाव में तन्मय होकर
किसी एक क्षण
जिसकी उपस्थिति को मुखरित करने
स्वयं पूरी तरह अनुपस्थित हो जाता है

उस सर्वाधार के प्रति
कृतज्ञता सहज ही मेरे प्रति खोल देती है
मेरी पूर्णता


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
मंगलवार, ७ जून २०११     

     

     

Monday, June 6, 2011

मंगल मौन में


यह जो
स्वर्ण कलश लेकर
सौभाग्य और समृद्धि उंडेलने वाली
लक्ष्मी जी हैं
इनका निवास स्थल
हमारे भीतर
उजागर करने
मौन की ताल पर
उन्नत ध्वनि की मंगल धारा
बह रही है जो सदियों से
इसके अनुनाद 
सुन नहीं पाते कोलाहल में

लो अनंत की रश्मियों से
शांत कर मन
बैठे अपने भीतर
स्वयं को पुकारें ऐसे
की स्वर लक्ष्मीजी तक भी
पहुँच जाए

स्वर्ण कलश लेकर
अमृतमय सौभाग्य और समृद्धि
उन्ड़ेलती मैय्या की छवि में
आस्था, आश्वस्ति और अक्षय आशा की
जो प्रेरक तान है
मंगल मौन में सुन कर इसे
क्यूं न धन्य हो जाएँ
अभी इस क्षण

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
६ जून २०११    
       

Sunday, June 5, 2011

आश्वस्त आनंद में


यह जो
उमड़ता है  भीतर
अनुनादित तुम्हारे स्वर से
झरना आनंद का
उल्लास के मेघ बरसते
पुलकित मन की धरा पर
सजता है उत्सव
कितने रूप लेकर
खेलते खिलते भी
तुम एक अकम्पित
समन्वित 
शक्ति पुंज
मंगलकारी
इस तरह अपने स्वर मात्र से
खिल सकते हो मुझमें
यानि
हर मनुज में

प्रश्न सारे लुप्त हो गए हैं जो
तुम्हारे आने पर
अब उनके फिर लौटने के बारे में
क्यूं सोचूँ

सोच से परे का
मद्धम उजाला फ़ैल रहा है
मेरे अस्तित्तव  में

साँसों में
इस तरह शाश्वत का सहज गान

 और तन्मय हुआ मैं
लीन हूँ उस स्वर में
जो उस पार से आता है
पर लगता है
इस पार भी स्वर वही है
जिससे अनुनादित हुआ
मैं झूम रहा हूँ
शुद्ध सरस आश्वस्त आनंद में

अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका
५ जून २०११                   

Saturday, June 4, 2011

जो है



एक स्थल ऐसा
जहाँ
पकड़ना नहीं कुछ भी
छोड़ देना
छोड़ देना, छोड़ने का भाव भी
बस हो रहना
उसका
ऐसे जैसे सागर की हो जाती है
नमक की डली
और अगर
डली हो शक्कर की
तो भी
उसे नहीं चिंता
अपने प्रभाव की
अपनी पहचान की
घुलना आता है उसे
जैसे
अपने से विस्तृत एक में
घुलना टूटना नहीं
विस्तृत हो जाना है
और
विस्तार के लिए
करना कुछ नहीं
बस छोड़ भर देना है
ऐसे
की
छूट जाए
छोड़ने का भाव भी

महत्त्व नहीं इसका
की क्या साथ लिया
क्या साथ ली था
जो है
जैसा है
सब छूट जाना है
जाने अनजाने
सोच कर जब हम
सोच से परे पहुँचते हैं
तो एक आलोकित शून्य
करता है स्वागत
और सौंप दे सकता है
उस अक्षय पूर्णता का स्वाद
जो सिर्फ वही दे सकता है
जो है

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
४ जून २०११  
                 

Friday, June 3, 2011

आत्माभिव्यक्ति के लिए


करना प्रारंभ करने पर
हो जाता है कितना कुछ
वर्ना
बैठे बैठे
घेर लेते हैं
संभावित असफलता के कई कारण
या फिर
करने के औचित्य पर प्रश्न लगा कर
हम बैठे बैठे
निष्क्रियता का हाथ थामें
देखते रहते हैं
लहरें कर्मशील सागर की

अनसुना करते
कई लहरों का बुलावा
और
उनके साथ साथ
लौट जाते हैं
हमारे हिस्से के हीरे-मोती

सब कुछ वैसा ही हो
जैसा हम चाहते हैं
संभव ही नहीं

पर कुछ गढ़ने के प्रयास में
स्वयं को गढ़ने के लिए
सृष्टा को आमंत्रित कर
उसके सान्निध्य की सौरभ का आनंद
संभव तभी है
जब हम
आत्माभिव्यक्ति के लिए
कुछ करने का श्रीगणेश करें


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
४ जून २०११               

Thursday, June 2, 2011

तत्क्षण


हर बात से परे
एक शून्य का सा भाव प्रकट कर
उसके आलोकित वृत्त में रमते हुए
सहसा पुराने बीजों में से
अंकुरित होता है
कुछ नया
पहले कोपलें 
फिर वृक्ष
इस वृक्ष के साथ
कितनी शताब्दियों से जुड़ा हुआ हूँ मैं 

और हर बार
शून्य तक पहुँच कर
जब जब सोचा है
पूर्ण हो गयी यात्रा

न जाने कैसे 
शरारती बच्चे की तरह
ये कुछ बीज चहक कर कहते हैं
अभी पूर्णता नहीं 
अभी तो हम हैं
हमारी यात्रा है
उग कर तुम्हे लुभाने की
नचाने की
और तुम्हारे नृत्य में से
कुछ नए बीज बनाने की

अब उसकी गोद में बैठ कर
जिसके बीज से पनपा हूँ मैं  
पूछ रहा हूँ
शून्य तक जाने का वह तरीका
की कोई बीज छुप कर
आ ना पाए मेरे साथ

यूं लगता है 
उसने कहा है
'तुम मुझसे छुप कर 
एक कदम भी मत चलो
बीज बनने ना पायेगा
प्रकट रहो 
पूरी तरह मेरे प्रति
पूर्ण ही पाओगे
स्वयं को 'तत्क्षण'

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
२ जून २०११              

Wednesday, June 1, 2011

होने न होने से परे



पाने और खोने से परे
यह जो
एक महीन आलोक है
मगन अपने आप में
पूर्णता की आभा लिए

निर्भर नहीं जिसका होना
किसी और के होने पर

इस आलोक के
आस पास से
आते जाते हम कई बार इसे देख ही नहीं पाते

क्यूंकि हम 
या तो खोये हुए की कसक में डूब जाते
या कुछ पाने की आस में मगन हो जाते

चल मन 
एक नया खेल करें
छुप्पा- छुप्पी इस बार ऐसे खेलें
की तुम छुप कर
उसे ढूंढ लाओ
जो छुपा हुआ है
तुम्हारे होने से

वैसे तुम्हारे होने में भी
है तो वही
पर छुप जाता है
उसका होना मेरे प्रति
क्यूंकि मैं
देख ही नहीं पाता तुम्हारे परे

चलो मन
इस बार ऐसा खेल खेलें
तुम हार कर जीतो
और 
मैं जीत कर हारूं
इस तरह
जब हार और जीत
एक समान हो जाएँ हमारे लिए
शायद खुले 
उसका होना 
हमारे लिए ऐसे
की
फिर खेल हमारा नहीं
बस उसका ही हो जाए
और हम
बस देखें
देखें और पिघल जाएँ
स्वर्णिम धारा में
होने न होने से परे


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
१ जून २०११        
     
      

आनंदित निर्झर

छम छम बरसे प्रेमामृत सा खिला करूण अलोक अपरिमित मौन मधुर झीना झीना सा सरस सूक्ष्म  आनंदित निर्झर तन्मय बेसुध  लीन....  ...