Monday, June 20, 2011

पूर्णता का बोध

 
थकान  के बीच
शेष रहती है
कोमल, ताज़ी हवा
और थोड़ी सी मिटटी
जिसमें संकल्प का बीज रोप कर
देखना चाहता हूँ
तुम्हारा वो चेहरा
जिससे मिट जाता है 
अधूरापन
छलछलाता है
पूर्णता का बोध
और अमूर्त भाव में भी
आनंद का स्वाद लेता
झूम झूम जाता हूँ मैं
 
 
अशोक व्यास
१९ जून २०११
           

1 comment:

प्रवीण पाण्डेय said...

गहरी साँस भर उसे याद करने से थकान न जाने कहाँ चली जाती है।

वहाँ जो मौन है सुंदर

वह जो लिखता लिखाता है कहाँ से हमारे भीतर आता है कभी अपना चेहरा बनाता कभी अपना चेहरा छुपाता है वह जो है शक्ति प्रदाता  ...