Saturday, June 25, 2011

बहती नदी के किनारे



जो कुछ साथ लाया था
सब छोड़ दिया है 
तट पर
नदी में उतरने से पहले
यह याद भी नहीं की मुझे तैरना आता है या नहीं
कुछ दूर उतरने के बाद
ये पता चल जाता है की
मुझे डूबना भी नहीं आता


सुरक्षित रहने की चाह
मेरे भीतर रख कर
दिन-प्रतिदिन
मेरे आस पास
असुरक्षा के संकेत बढाने वाले
तुम मुझे जो कुछ सिखाना चाहते हो
उसके लिए
क्या जरूरी था
इतनी गहराई
इतनी ऊँचाई
इतने कांटो पर से मुझे चलाना

देखो, शिकायत न समझना मेरी इसे
पर
यह सब जो
उत्पन्न कर रहे हो मेरे चारो और
ये मनोवृत्तियां, जो तुम्हे देखने के मेरे ढंग पर अंकुश लगाती हैं

ये उथलापन, ये देह का उत्सव मनाने 
और मनमाने ढंग से जीवन को सजाने 
के नित्य नए अप्राकृतिक तरीके

मेरी धडकनों ने बरसों से
जो पाठ पढ़े हैं
उनको लेकर
अपनी अनुभूतियों तक पहुंचाने के लिए
क्या अब
गुफा में जाकर बैठ जाने के अलावा
कोई चारा नहीं है

हे कृष्ण
क्या एक साथ 
कई कई संसार बना कर
तुम ये चाहते हो
की हम अपने संसार में रहते हुए
दुसरे संसार से पूरी तरह विलग रहें
क्या इसी को तुम 'अनासक्त' होना कहते हो

थक कर
बहती नदी के किनारे
प्रणाम कर रहा हूँ जब सूरज को
बात तुम से ही कर रहा हूँ केशव
मेरी छोडो
अब तुम्हारे लिए भी
अधिक चुनौतीपूर्ण हो गया है क्या
हमें उबारना

या फिर
तुम्हें जानने के मेरा प्रयास को
बड़ी लम्बी यात्रा तय करनी है
अब तक

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
२५ जून २०११  
 
                    

2 comments:

Rakesh Kumar said...

बहुत सारी शिकायेतें कर डाली हैं इस बार कान्हा से आपने.कान्हा सब जानता है.हम अपनी वासनाओं के कारण ही तो बंधन में बंधें हैं. कान्हा का क्या कसूर.
प्रेम रंग में रंगी लंबी यात्रा भी बहुत छोटी लगने लगती है.

प्रवीण पाण्डेय said...

उतरना तो है ही, सीखेंगे या बचा लिये जायेंगे।

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