Monday, June 27, 2011

मौन की दुर्लभ डलियाँ


जटाओं में जब 
ठहर गयी थी गंगा,
मगन अपने आप में
पशुपतिनाथ
जिस मौन का
सघन केंद्र बन
अपने आप में सम्माहित
जिस परम अनुभूति से
हृदय को
सम्पूर्ण सृष्टि का
केंद्र बना कर
बैठे थे
त्रिलोकीनाथ

उस मौन की दुर्लभ डलियाँ
शब्द गंगा रूप में
अब भी 
हो रही हैं
प्रवाहित
उतरती हैं
कृपा सिंचन करती
जब भी
 बुलाता है
भागीरथ रूप लेकर मन


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
             २७ जून २०११                

2 comments:

प्रवीण पाण्डेय said...

जग घनघोर, मौन शिव बैठे।

Rakesh Kumar said...

सुन्दर,अदभुत, अनुपम चित्र.
महादेव पशुपतिनाथ को शत शत प्रणाम.
तृप्त कर रही भागीरथी हृदय को
देकर 'उस मौन की दुर्लभ डलियाँ'.
अशोक भाई,अनमोल है आपकी यह शिव समर्पित प्रस्तुति.

वहाँ जो मौन है सुंदर

वह जो लिखता लिखाता है कहाँ से हमारे भीतर आता है कभी अपना चेहरा बनाता कभी अपना चेहरा छुपाता है वह जो है शक्ति प्रदाता  ...