Tuesday, August 31, 2010

सत्य इस क्षण का

 
 1
सत्य इस क्षण का
चुपचाप
देखता है
मेरी ओर
ऐसे 
जैसे
बच्चे को खेलते हुए
देखती है माँ
 
२ 
सत्य इस क्षण का
नहीं अधीर कि मैं
करूँ अभिव्यक्त उसे
ना उसे इस बात से सरोकार
कि
मेरे द्वारा हो उसकी जय जयकार
सत्य
सम्पूर्ण है अपने आप में
रमा हुआ अपने सीमारहित स्वरुप में
मैं
इस क्षण के सत्य को
सम्पूर्ण सत्य से अलग करके देखता हूँ जो
मेरी इस नादानी पर भी
करूणामय मुस्कान लुटाता है
एक वह जो सत्यस्वरूप

उससे संवाद के लिए
मौन हो जाना चाहिए मुझे
पर
बोलना सीखने के बाद
 भूल सा गया हूँ
चुप होना 

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
मंगलवार, ३१ अगस्त 2010


 


Monday, August 30, 2010

चाहे पतझड़ हो या सावन


 
संकेत जो भी थे
गलत पढ़ गया
विपरीत दिशा में
आगे बढ़ गया
 
पलटते हुए 
बीत गया एक जीवन
पर इस तरह
विस्तृत हो गया मन

और हर मौसम में
गुनगुनाना सीख गया मन
सब कुछ सुहाना लगता है
चाहे पतझड़ हो या सावन

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
३० अगस्त २०१०, सोमवार

Sunday, August 29, 2010

अपने होने की आश्वस्ति



 
हर दिन
नए सिरे से
तलाशता हूँ
अपनी ज़मीन,
आश्वस्ति दिशा के बारे में 
पूछता हूँ आसमान से,
हवाओं में से अजनबीपन हटाने
मेरी साँसे
गुनगुनाती हैं तुम्हारा नाम,
सन्नाटे में
कभी कभी
घना एकांत जकड कर मुझे
झकझोर देता है जब
मैं ढूंढता हूँ 
वो पुल
जो मुझे दुनिया से जोड़ते रहे
 
ये पुल
अपने होने की आश्वस्ति देने वाले
मुझे किसी ओर से जोड़ते हैं
या मुझे मुझ तक ही ले आते है किसी अज्ञात रास्ते से?
 
ये पुल विस्तार दिखाने वाले
कौन बनाता है
कौन मिटाता है
कुछ समझ नहीं आता है

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
रविवार, २९ अगस्त २०१०

Saturday, August 28, 2010

खेल परतों का है


 
जीवन
अपेक्षाओं की रस्सा-कशी
इच्छाओं का जंगल
लेन-देन का संग्राम है 
भंवर में
फंस कर कभी सोचते हम
शांति किस चिड़िया का नाम है
 
हर वो बात
जिसे बहुत खास
समझते हम
बेपर्दा हो, तो बहुत आम है 
खेल परतों का है
परत दर परत
छुप्पा-छुप्पी खेलता
सृष्टा का पैगाम है

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
शनिवार, २८ अगस्त २०१०

Friday, August 27, 2010

समन्वय का सुन्दर स्वर

 
1
देखते-देखते
बहती नदी 
रेत के टीलों को 
कर देती है समतल,
बहाव में
सम का सौंदर्य 
प्रकट हो जाता
पल पल

2
खोने-पाने के झूले 
से उतर कर
एक कोई
मद्धम सुर में
साँसों का मधुर गीत
सुनता- सुनाता है
और
बहते बहते
समन्वय का सुन्दर स्वर 
फ़ैल फ़ैल कर
सृष्टि का सार दिखाता है

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
२७ अगस्त २०१०

Thursday, August 26, 2010

उसका स्वर्णिम उपहार लेकर

                                                                          ( चित्र - ललित शाह)


अब भी
समाप्त नहीं हुआ है
वो चक्र
जिससे निकल कर 
आ रहे हैं
जन्म और मृत्यु
 
मृत्यु के इस पार 
जीवन का उत्सव मनाते हुए
संवेदना की राग पर
ये कौन है
जो दिखला रहा है
जन्म-मृत्यु से परे जाने का पथ

इस 'कालातीत' की मुस्कान से
झरता है
शाश्वत प्रेम का झरना सा
भीग भीग कर
अनंत की करूणा में
उसका स्वर्णिम उपहार लेकर
निकलता हूँ
बांटने 
संकोच के साथ,

संकोच इस बात का 
कि कोई दूत को ही ना मान बैठे दाता


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
गुरुवार, २६ अगस्त २०१०


Wednesday, August 25, 2010

बारिश बज रही है

कविता -१

दौड़ कर शिखर तक पहुँच 
हाँफते हुए
उसने देखा
क्षितिज को
और सोचा
काश वो यहाँ ना होकर
वहां होता
जहां धरती मिल रही है आसमान से



जहाँ भी हैं
वहाँ
जितना सौंदर्य और विस्तार है
उससे जुड़ने के लिए
'एक वो' अनाम खुलापन
और
स्वयं का स्वीकरण सा चाहिए

क्या संभव है
इस तरह  
अपने आपको अपनाना कि
सारे संसार को अपना सकें
बिना किसी असंतोष
बिना किसी तोड़-फोड़ के?

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
बुधवार, २५ अगस्त २०१०

कविता -२ 

बारिश बज रही है
बूँदें खनक रही हैं
पत्तों पर
बिछे हैं
मधुर गीत से
तत्पर है
लरजने को
सरकने को
हल्के से स्पर्श के साथ
और भीगी हुई इस सुबह में 
एक कोई
छूकर मन को
छेड़ रहा है
राग पूर्णता का

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
२५ अगस्त २०१०


Tuesday, August 24, 2010

प्रार्थना के फल



प्रार्थना के फल जब सामने आते हैं
हम उनको देख ही नहीं पाते हैं

दिखता तो है कि जो माँगा, पाया
पर उसे अब एक संयोग ठहराते हैं

और कई बार ऐसा भी होता है 
हम प्रार्थना का रूप भूल जाते हैं

मिलने की खुशी मनाना छोड़
नई इच्छा का खेल रचाते हैं 

समझाता कोई नहीं, किसी को
 वक़्त से क्यूं हम सब हार जाते हैं


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
२४ अगस्त २०१०

Monday, August 23, 2010

बात यूं ही नहीं होती सुलभ



बात कभी कुएं की मुंडेर पर नहीं होती
नीचे होती है
गहराई में
शीतल जल के साथ
मगन अपने आप में
एक छोटे घेरे में
सागर के सन्देश की तन्मयता लिए

बात
यूं ही नहीं होती सुलभ
खुलेपन से स्वीकारने
उतरना होता है गहरे में
 
जीवन के कोलाहल से मुक्त 
अनिश्चय के भय को छोड़ कर
प्रवेश और निकास, दोनों के लिए
सामर्थ्य जुटा कर
जो बात तक पहुँच जाता है
उसके लिए
अन्दर और बाहर का भेद
मिट जाता है शायद

वह जब पारदर्शी होकर
जीवन के अनंत गौरव की कथा
सुनाता है
तो आश्वस्त करता है
उसकी बात पर कुछ विश्वास सा
हो जाता है


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
२३ अगस्त २०१०, सोमवार

Sunday, August 22, 2010

तुम प्यार का सागर बहाओ




 
1
अपने आप
उग आई पटरियां
चेतना भागने लगी
उजियारे खेतों के बीच
संवेदना के गाँव से होकर
मंगल कामना का सन्देश लेकर

2
 इस बार 
वो सोचने लगा
कैसे कोई हो सकता है तैयार
क्या हो, अगर एक इंसान हो जाए लाचार

सारी शिक्षा, सारे शुभ भाव
क्या तिरोहित नहीं हो जायेंगे
अगर वो हम पर
बन्दूक की गोलियां चलाएंगे
निर्दोष लोगों को सतायेंगे 
3
ये क्या है 
जो हमें सुरक्षित रखे हैं
ये क्या है
जो हमें सुरक्षित रख सकता है

वो सब जघन्य
और क्रूर, अमानवीय, घृणित व्यवहार 
जो दुनिया के किसी एक
हिस्से में होता है
वो कहीं भी दोहरा सकता है अपने
आप को
4
उसने फिर सोचा
यदि स्याही फ़ैल सकती है
तो क्या उजाला नहीं फ़ैल सकता
यदि घृणा पसर सकती है
तो क्या प्रेम का विस्तार नहीं हो सकता 

'श्रद्धायुक्त सोच 
एक सुरक्षा कवच 
बनाती है
ऐसी सुरक्षा
जिसके कारण 
मानवता हर हमले के बाद
भी
बची रह पाती है
5
चाहे कोई नफरत का लावा बहाए 
तुम प्यार का सागर बहाओ

वो भले ही विनाश का बिगुल बजाये 
तुम सृजनशीलता की शहनाई सुनाओ

बढ़ो शाश्वत प्रेम पताका लिए 
निर्भय, निर्द्वंद
निरंतर निर्माण का शंखनाद बजाओ

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
रविवार, अगस्त २२, २०१० 

Saturday, August 21, 2010

अक्षय शांति पथ



 
बहुत देर तक 
करता रहा विचार
और पहुंच गया
वहीं फिर एक बार
जहाँ 
समन्वय है, शांति है, सद्भावना है
सबके कल्याण की प्रार्थना है

एक दो राहे पर
जहाँ से
एक रास्ता 
शत्रुता, हिंसा और अशांति की तरफ ले जाता है
कौन है  जो 
मुझे हमेशा
इस अक्षय शांति पथ की ओर ले आता है


मैं ये भूल नहीं पाता
मेरी साँसों में
सबके कल्याण की रसमय गाथा है
और 
कृतज्ञता से देखता हूँ उसे
जो मुझे यह शाश्वत कथा याद दिलाता है


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
शनिवार, २१ अगस्त २०१०

Friday, August 20, 2010

तुम जो अक्षय आभा वाले हो


जो कुछ 
मैं अपनाता हूँ
धीरे धीरे अपनी चमक खोने लगता है
मेरा ही सपना पूरा होते होते
लगता है  मुझे ठगता है 

क्या ऐसा नहीं हो सकता
मैं सिर्फ तुम्हे अपनाऊँ
तुम जो अक्षय आभा वाले हो
तुम, जिससे सूरज भी उजियारा पाता है

और जो कुछ अपनाया या 
ठुकराया जाना है जीवन में
बस तुम अपनाओ या तुम ठुकराओ 
जीवन यूँ भी दिया है तुमने
अब इसमें से मेरी 'छोटी सी मैं' को हटाओ
 
रुकती सी लगे है 'जीवन धारा'
अपनी मुस्कराहट से इसको गतिमान बनाओ 

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
२० अगस्त २०१०

 
 


Thursday, August 19, 2010

अपूर्णता का उपहार देकर



नया लिखने के लिए 
साहस और सृजनशीलता चाहिए
तब
जब
आप सच लिखना चाहें
और प्रस्तुत हों अनावृत होने के लिए
 
२ 
नया लिखना तब संभव है 
जब आप अंदरुनी तौर पर
शब्दों के साथ
गढे जाने को तैयार हों
एक कोई है जो
अनगढ़ा बनाए रखता है
निरंतर हमें 

शेष रह जाता है
'कहीं कुछ'
जिससे और परिष्कृत हो सकते हम
इस तरह
नए नए ढंग से 
अपूर्णता का उपहार देकर
 बनाए रखता है वो 
हमारी सृजनशीलता
 
अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका
गुरुवार, १९ अगस्त २०१०



Wednesday, August 18, 2010

जुड़े रहने की चाह

(चित्र- अशोक व्यास)

 
अब नए नए तरीके हैं
संपर्क करने के
पर आज भी
जुड़े रहने की चाह 
जहाँ से आती है 
वो जगह
वही है
जो तब थी

और उस जगह तक पहुचने में
मेरे अलावा और कोई
नहीं कर सकता
मदद मेरी 

(चित्र- ललित शाह)


नए नए तौर-तरीके लेकर
एक पुरानी गुफा के पास
पहुँचता हूँ
हर दिन
पर
वहां जाकर
वही एक फूल चढ़ा पाता हूँ
जो मैंने किसी यन्त्र से नहीं पाया

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
बुधवार, १८ अगस्त २०१०



Tuesday, August 17, 2010

कर्म और सोच का अंतर





ऐसा क्यूं होता है
वह सब
जिसे हम कभी
फालतू मान लेते हैं
किसी एक क्षण में
बहुत महत्वपूर्ण हो जाता अचानक

किसी का पुराना पत्र
किसी चीज़ का बिल
किसी का मुस्कुराना
किसी शुभ समाचार का आना
2
मान्यता की लहर
आवश्यकताओं से हाथ मिला कर 
अनुभूति की सतह पर
चुपचाप कुछ नया रचती है
दिन पर दिन
कुछ इस तरह 
कि
अपने आपसे परिचित बने रहने के लिए
हमें खुद को देखना होता है
बार बार

विस्मय है
किसी दिन, हम स्वयं को पहचानते हैं
और किसी दिन स्वयं के लिए नए हो जाते हैं
3
और इस सबके बीच
एक वो नयापन भी है
जिसको हम
तपस्या कर-करके बुलाते हैं
पर हवा के खेल में
उस पर से भी नज़र हटाते हैं

हममें कई तरह के लोग हैं
एक वो
जो सिर्फ सोचते जाते हैं
एक वो
जो कर्म करते जाते हैं
और कुछ ऐसे भी हैं
जो कर्म और सोच का अंतर
मिटाते जाते हैं
सोच कर देखें
आप किस श्रेणी में
आते हैं ?

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
मंगलवार, १७ अगस्त २०१

Monday, August 16, 2010

सपने का एक अनदेखा संसार

                                                                (चित्र- ललित शाह)



वो सब
जो होता है हमारे साथ
हमारी सक्रिय भूमिका के बावजूद
उस सबके होने की योजना
क्या हमने ही बनाई होती है?

क्या हम सचमुच तय कर सकते हैं
जीवन में हमारे साथ क्या हो
और क्या ना हो

बात कमजोर या ताक़तवर इंसान की भी नहीं
बात है 
जीवन के आश्चर्य की

कौन कब कहाँ मिले, कैसे बात करे
क्या बात करे
हम उसे क्या कहें
कहने- सुनने से क्या बात आगे तक बनी रह जाए

बात चाहे किसी गरीब किसान की हो
या बड़े देश के राष्ट्रपति की,
सब कुछ किसी मनुष्य के इख्तियार में नहीं है
 
फिर भी
योजना बनानी है, बनने-बनाने में जुट जाना है
इस तरह
अपनी अन्तर्निहित संभावनाओं का पता पाना है 
कहीं ना कहीं
हमारी सफलताओं और असफलताओं से
हम मुक्ति के उस विस्मित क्षण तक आते हैं
जहाँ ये जान पाते हैं 
कि हम उतने ही नहीं हैं
जितना सीमित मान कर कभी हम
घबराते हैं या इतराते हैं 


शायद इस असीम के कारण 
हम अपने भीतर
सुन्दरता का एक हिस्सा
आनंद का एक कोना
माधुर्य की एक धारा
संवेदनशीलता का एक कतरा 
सपने का एक अनदेखा संसार
हमेशा बचा हुआ पाते हैं
 
अजीब बात है
सहज सुलभ विस्तार की अनदेखी कर
हम सीमाओं से परे जाने को छटपटाते हैं
पर हर दिन अपने लिए एक नया घेरा बनाते हैं
जिसके लिए कर रहे हैं सारा 'व्यवहार'
उसी को अपने 'व्यवहार' से छुपाते हैं


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
सोमवार, १६ अगस्त २०१० 


Sunday, August 15, 2010

खुद को छोड़ने की कला


                                                                           (चित्र- ललित शाह)


यहाँ और कोई नहीं
मैं भी नहीं
बस एक अदृश्य उपस्थिति
जिससे प्रकट होते सारे दृश्य 
जिससे जुड़ कर
अर्थ पाती साँसों की श्रंखला

यहाँ और कोई नहीं
मैं भी नहीं
बस एक वह
जिससे मैं हूँ
जिससे मेरा होना 
महत्व पाता है
 
जिसको लेकर
जा सकता हूँ अपने से पार
उसे अपनाने 
खुद को छोड़ने की कला
जहाँ, जिस रूप में भी मिल जाए
आतुर हूँ सीख लेने को 

यहाँ
वह है 
जो सिखाता है
मिट कर भी
कैसे अमिट हुआ जाता है
 
अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका
१५ अगस्त २०१०


                                      (चित्र- ललित शाह)

शिष्टाचार और मर्यादा
समाज के लिए हैं
पहाड़ो पर नाचती हवा के लिए नहीं
झरने की कल- कल के लिए नहीं

उगते सूरज की शायद मर्यादा है कोई
पर
किरण के स्पर्श से
रंग-बिरंगे पंख फैला कर
फूल के केंद्र पर
जा बैठती तितली
प्रदर्शन के पैमानों की
मोहताज़ नहीं

वह जो
बाहरी प्रभाव से परे
लीन है
सहज आत्म-प्रकटन में,
उसकी मस्ती 
तुम तक पहुंचा तो नहीं सकती 
पर उस मस्ती की झलक तुममें भी जगा सकती है कविता 

अशोक व्यास
१५ अगस्त २०१० 
न्यूयार्क, अमेरिका

Saturday, August 14, 2010

जिसमें शेष हो चुकी है हमारी भूमिका


कितना कुछ
छोटा छोटा
घेर लेता है हमें
दिन पर दिन
जोड़ते जाते हम
कुछ और चीज़ें, कुछ और रिश्ते,
कुछ और अनुभव, कुछ नई शिकायतें,
कुछ नए निशान उपलब्धियों के, आभार के

धीरे धीरे
वह
जो जिया जा चुका है
वह
जिसमें शेष हो चुकी है हमारी भूमिका
एक परकोटे की तरह
छा जाता है हमारे चारों ओर

ऐसे की
हममें और
कुएं के मेंढक में
कोई फर्क नहीं रह जाता

अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका
१४ अगस्त २०१० 

पुनश्च - 
क्या कभी ऐसा हुआ
कि अपने ही हाथ की बनी चाय
बहुत स्वाद लगी हो
इतनी अच्छी कि उस स्वाद को
परिभाषित करना
मुश्किल हो जाए?

और फिर किसी नए दिन
 चाय की तलब 
क्या दूर कर सकता है
पुराना स्वाद?

आदतन
 बासी अनुभूतियों से
इस क्षण में सुन्दर सार रंग 
भरने का प्रयास करते 
 हम
नक्शा देख कर
दुनिया देख लेने की आश्वस्ति
दे लेते स्वयं को

पता नहीं इस छल से
नुक्सान दुनिया का है
या हमारा?


अशोक व्यास
१४ अगस्त २०१०


Friday, August 13, 2010

संतुलन का एक शांत क्षण


 
1
सपने, आशायें, संकल्प
दिशाएं, संभावनायें, विकल्प
 
अपने पांवों के नीचे 
ज़मीन के रहस्यमयी सन्देश को सुनने
उस दिन
बैठा था जब
समुद्र के किनारे

लहरों ने खींच लिया ध्यान
अपनी ओर,


लहर के खेल में
ज़मीन तो क्या
सागर भी नहीं देता दिखाई


आज अपने मन की सब लहरें
लेकर
अपने मूल तक पहुँचने
संतुलन का एक शांत क्षण माँगा है
उससे
जो समय के साथ साँसों का
सम्बन्ध बनाता है


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
१३ अगस्त २०१० 

उम्र भर हम अपनी चाहत को चमकाते हैं
और ठीक समय पर उसकी तरफ देखना भूल जाते हैं




 

Thursday, August 12, 2010

रहस्य अपने होने का






 
तब भी था 
यह संसार 
जब मेरा जन्म नहीं हुआ था 
और 
रहने वाला है 
इस धरातल से मेरी विदाई के बाद भी
 
संसार का होना 
मेरे होने पर निर्भर नहीं है
 
तो फिर
मेरा होना भी
 क्यूं निर्भर हो संसार के होने पर?

अपने होने का अपरिवर्तनीय आधार छू लेने
अपने जन्मदिन पर
उस विस्मित अखंड चेतना को बुला कर
क्या पूछ सकते हैं हम 
रहस्य अपने होने का?

पर संसार से छूटे बिना
संभव नहीं
यह सूक्ष्म, निःशब्द मुलाक़ात
और हर वर्षगाँठ पर
हम गाँठ खोलना नहीं
और अधिक गांठे लगाना सीखते हैं


इस बार यह जान कर कि
गाँठ खोलने का कौशल
कोई दूसरा नहीं सिखा सकता किसी को
 
सहसा यह बोध भी हुआ है कि
हम चाहते ही नहीं 
गांठे खोलना
बंधनरहित होने से एक तरह का भय है हममें
और
निर्भय हुए बिना
खेल निर्भरता का
चलता ही रहने वाला है
एक जन्मदिन से दूसरे जन्मदिन तक

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
१२ अगस्त २०१०

 
 

Wednesday, August 11, 2010

छुपा हुआ व्यवहार तुम्हारा





सचमुच में संसार तुम्हारा सच्चा है
छुपा हुआ व्यवहार तुम्हारा अच्छा है

चाहे कोई साथ चले या रुक जाए 
पग पग पर आधार तुम्हारा अच्छा है

सोच रहा था साथ उम्र के हुआ बड़ा 
पर मुझमें अब तक कोई एक बच्चा है 

तुमको बतलाने से बात संवर जाए
वरना मेरी समझ का दाना कच्चा है

छोड़ दिया गर सब कुछ तेरे द्वारे पर
मन में क्यूं फिर लेन-देन का चर्चा है


अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका
बुधवार, ११ अगस्त २०१०








Tuesday, August 10, 2010

बदलाव के सौम्य कदम




(देखते देखते सुन्दर हो जाता परिवर्तन-  चित्र- अशोक व्यास)


किसी एक अनजान क्षण
बढ़ने लगती है 
जब
आवेश की धारा 
मेरे भीतर,
 
बदल जाता है
प्रतिक्रिया का समीकरण
उत्तेजना और क्रोध का मिश्रण
अगुआ कर लेता 
मेरा परिचय,
 
संतुलन छिन्न-भिन्न होता
सहज हास्य भी
आग में घी सा काम करता है

ऐसे में
तटस्थ होकर देखता हूँ
अपने भीतर उमड़ता लावा सा

एक विद्रोह का बगूला सा
आपत्ति उठाता व्यवस्था के प्रति
परिवर्तन की कंटीली प्यास सी
और फिर
अपने को विनाश से बचाने
धीरे धीरे
इस सर्पीले क्रोध को
शांत करने
उतरता हूँ
आत्म-गंगा में
डुबकी लगा कर
विस्तृत सन्दर्भों की चेतना में
धीरे धीरे मुक्त करता हूँ
सहानुभूति, करूणा, प्यार
और
स्वीकार करते हुए उस क्षण को समग्रता से
बदलाव के सौम्य कदम उठाता
आवेश मुक्त मैं
फिर से जी उठाता हूँ
अपने निष्कलंक विराट रूप में


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
१० अगस्त २०१०

Monday, August 9, 2010

सुन्दरता का अनूठा राजद्वार


 
जहां भी हो
अचानक, चुपचाप, देखते-देखते
सबके बीच से
उठा कर आपको
ले जा सकती है
चुरा कर
साथ अपने
'नींद',

नींद, निश्छल, निर्दोष और
विश्रांति प्रदायक सखी
जाग्रति के विपरीत लगती है यूं तो
पर
जाग्रत रहने के लिए
आवश्यक स्फूर्ति देकर
फिर छोड़ देती है
वहीं
अनायास
 

सोना भी है कुछ ऐसा
जो किया नहीं जाता
हो जाता है,
 
ऐसा होना
जिसमें इंसान 
अपनी सुध खो जाता है
हमारे संतुलन के लिए
आवश्यक है
नींद, 
सुन्दरता का अनूठा राजद्वार 
खोलती है
सपनो के साथ साथ
हकीकत से जुड़ने के लिए भी
जरूरी है
कि हम
जहां हैं
वहां से दूर
किसी ऐसे लोक तक जाएँ
जहां अपनी पहचान का सीमित घेरा छूट जाता है
परिधि विलीन होती
और हम
चेतना के साथ ऐसे एकमेक होते
कि जैसे हम ही हम हैं

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
९ अगस्त २०१०

Sunday, August 8, 2010

मनुष्य होने का गौरव


रक्षा राखियाँ करती हैं
या वो भाव जिसको लेकर राखी बंधती है
आत्मीय कटिबद्धता क्या एक दिन तक सीमित है?
राखी जिस जीवन शैली को सहेजने,
जिस जीवन दृष्टि को व्यवहार में लाने का नाम है 
उसके लिए
धागा बाँधने से पहले जिस सुन्दर सार से
बंधा होता है ह्रदय
वो बंधन मुक्ति देने वाला 
अब भी होगा 
भारत की हवा में
पर सबको दिखाई नहीं देता
कई बार देखने का अर्थ महसूस करना होता है
महसूस करने के लिए जो संवेदना चाहिए
वो संवेदना बची रहे साँसों में
इसीलिए लिखता हूँ कविता
जाता हूँ मंदिर
सुनता हूँ प्रवचन
पढता हूँ शास्त्र
जो भी करता हूँ
इसलिए करता हूँ कि
मनुष्य होने का गौरव धड़कता रहे
मेरे भीतर
और हर मनुष्य की गरिमा का सम्मान करते हुए 
सहज ही सृष्टा का मान
करता रहूँ निरंतर

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
रविवार, ८ अगस्त २०१०

Saturday, August 7, 2010

सुनहरी गति का चित्र








 
लौट कर 
नई हो जाती है
वही जगह,
यात्रा में दिखने वाली चीज़ों के साथ
एक कुछ अदृश्य सा
चला आता है जो
साथ आँखों के 

उसके स्पर्श से
हर क्षण आतुर है
अपनी नई आभा उंडेलने 
 
व्योम सी देह वाला 
अपनी गोद में बिठा कर
नई तरह से 
खोल रहा है मेरा परिचय 
 
यह जो
सबसे बहुमूल्य है
इसकी सुनहरी गति का चित्र 
वही देख पाए 
जो अपने अपने स्थल से निकल कर
इस चिर नूतनता की यात्रा में
शामिल हो पाए
अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
७ अगस्त २०१०


Friday, August 6, 2010

शाश्वत प्रेम की पालकी


मन ही मन मधुर बात बनाना
जैसे संगीत-वाध्य को सुर में लाना
थोडा सुनना, थोडा बजाना
पहले सुन सुन कर सुर मिलाना
फिर मुख्य कार्यक्रम तक जाना

मन के वाध्य का सुर मिलाने
बैठ कर 
शब्द तानपूरे के साथ
धीरे धीरे
उठती है एक लय
उभर आता 'एकात्मकता का संगीत'

फिर कहीं से 
उतर आती शाश्वत प्रेम की पालकी
फिर से निर्मल उजियारा लेकर
करता हूँ यात्रा
अज्ञात द्वीप तक
और 
हर चेहरे में तुम्हे देखने की
अधूरी कोशिश को
पूरा होते देख कर
मौन में गाने लगता 
महिमा तुम्हारी


अशोक व्यास
न्यूयार्क,
६ अगस्त, 2010

Thursday, August 5, 2010

पाँव सपनो के

 
नए सिरे से
नींद का सुइया
ढूंढता है ज़मीन 
टिक कर चलने के लिए,
लौट कर भारत से
पाँव सपनो के
ज़मीन पर पड़ने से
कतराते हैं,

दूर रह कर
एक सपना है
भारत में होना,
एक यात्रा 
साकार कर देती सपना
कुछ ऐसे कि हम
सपने और हकीकत का अंतर
समझ नहीं पाते हैं

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
अगस्त ५, २०१०

कविता

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