Wednesday, August 25, 2010

बारिश बज रही है

कविता -१

दौड़ कर शिखर तक पहुँच 
हाँफते हुए
उसने देखा
क्षितिज को
और सोचा
काश वो यहाँ ना होकर
वहां होता
जहां धरती मिल रही है आसमान से



जहाँ भी हैं
वहाँ
जितना सौंदर्य और विस्तार है
उससे जुड़ने के लिए
'एक वो' अनाम खुलापन
और
स्वयं का स्वीकरण सा चाहिए

क्या संभव है
इस तरह  
अपने आपको अपनाना कि
सारे संसार को अपना सकें
बिना किसी असंतोष
बिना किसी तोड़-फोड़ के?

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
बुधवार, २५ अगस्त २०१०

कविता -२ 

बारिश बज रही है
बूँदें खनक रही हैं
पत्तों पर
बिछे हैं
मधुर गीत से
तत्पर है
लरजने को
सरकने को
हल्के से स्पर्श के साथ
और भीगी हुई इस सुबह में 
एक कोई
छूकर मन को
छेड़ रहा है
राग पूर्णता का

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
२५ अगस्त २०१०


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