Thursday, August 26, 2010

उसका स्वर्णिम उपहार लेकर

                                                                          ( चित्र - ललित शाह)


अब भी
समाप्त नहीं हुआ है
वो चक्र
जिससे निकल कर 
आ रहे हैं
जन्म और मृत्यु
 
मृत्यु के इस पार 
जीवन का उत्सव मनाते हुए
संवेदना की राग पर
ये कौन है
जो दिखला रहा है
जन्म-मृत्यु से परे जाने का पथ

इस 'कालातीत' की मुस्कान से
झरता है
शाश्वत प्रेम का झरना सा
भीग भीग कर
अनंत की करूणा में
उसका स्वर्णिम उपहार लेकर
निकलता हूँ
बांटने 
संकोच के साथ,

संकोच इस बात का 
कि कोई दूत को ही ना मान बैठे दाता


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
गुरुवार, २६ अगस्त २०१०


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