Sunday, August 29, 2010

अपने होने की आश्वस्ति



 
हर दिन
नए सिरे से
तलाशता हूँ
अपनी ज़मीन,
आश्वस्ति दिशा के बारे में 
पूछता हूँ आसमान से,
हवाओं में से अजनबीपन हटाने
मेरी साँसे
गुनगुनाती हैं तुम्हारा नाम,
सन्नाटे में
कभी कभी
घना एकांत जकड कर मुझे
झकझोर देता है जब
मैं ढूंढता हूँ 
वो पुल
जो मुझे दुनिया से जोड़ते रहे
 
ये पुल
अपने होने की आश्वस्ति देने वाले
मुझे किसी ओर से जोड़ते हैं
या मुझे मुझ तक ही ले आते है किसी अज्ञात रास्ते से?
 
ये पुल विस्तार दिखाने वाले
कौन बनाता है
कौन मिटाता है
कुछ समझ नहीं आता है

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
रविवार, २९ अगस्त २०१०

1 comment:

प्रवीण पाण्डेय said...

सच में, उत्तर नहीं मिल पाते हैं।

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