Saturday, August 28, 2010

खेल परतों का है


 
जीवन
अपेक्षाओं की रस्सा-कशी
इच्छाओं का जंगल
लेन-देन का संग्राम है 
भंवर में
फंस कर कभी सोचते हम
शांति किस चिड़िया का नाम है
 
हर वो बात
जिसे बहुत खास
समझते हम
बेपर्दा हो, तो बहुत आम है 
खेल परतों का है
परत दर परत
छुप्पा-छुप्पी खेलता
सृष्टा का पैगाम है

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
शनिवार, २८ अगस्त २०१०

No comments:

वहाँ जो मौन है सुंदर

वह जो लिखता लिखाता है कहाँ से हमारे भीतर आता है कभी अपना चेहरा बनाता कभी अपना चेहरा छुपाता है वह जो है शक्ति प्रदाता  ...