Friday, August 6, 2010

शाश्वत प्रेम की पालकी


मन ही मन मधुर बात बनाना
जैसे संगीत-वाध्य को सुर में लाना
थोडा सुनना, थोडा बजाना
पहले सुन सुन कर सुर मिलाना
फिर मुख्य कार्यक्रम तक जाना

मन के वाध्य का सुर मिलाने
बैठ कर 
शब्द तानपूरे के साथ
धीरे धीरे
उठती है एक लय
उभर आता 'एकात्मकता का संगीत'

फिर कहीं से 
उतर आती शाश्वत प्रेम की पालकी
फिर से निर्मल उजियारा लेकर
करता हूँ यात्रा
अज्ञात द्वीप तक
और 
हर चेहरे में तुम्हे देखने की
अधूरी कोशिश को
पूरा होते देख कर
मौन में गाने लगता 
महिमा तुम्हारी


अशोक व्यास
न्यूयार्क,
६ अगस्त, 2010

2 comments:

वन्दना said...

वाह ……………बस सबमे शाश्वत को देखना जब ये दृष्टि मिल जाती है तब ज़िन्दगी मे और कुछ जानने को नही बचता।

प्रवीण पाण्डेय said...

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