Friday, August 13, 2010

संतुलन का एक शांत क्षण


 
1
सपने, आशायें, संकल्प
दिशाएं, संभावनायें, विकल्प
 
अपने पांवों के नीचे 
ज़मीन के रहस्यमयी सन्देश को सुनने
उस दिन
बैठा था जब
समुद्र के किनारे

लहरों ने खींच लिया ध्यान
अपनी ओर,


लहर के खेल में
ज़मीन तो क्या
सागर भी नहीं देता दिखाई


आज अपने मन की सब लहरें
लेकर
अपने मूल तक पहुँचने
संतुलन का एक शांत क्षण माँगा है
उससे
जो समय के साथ साँसों का
सम्बन्ध बनाता है


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
१३ अगस्त २०१० 

उम्र भर हम अपनी चाहत को चमकाते हैं
और ठीक समय पर उसकी तरफ देखना भूल जाते हैं




 

2 comments:

वन्दना said...

वाह्…………काश ऐसा हो पाये।

प्रवीण पाण्डेय said...

सागर को तो हम लहरों के माध्यम से ही जानते हैं।

कविता

कविता न नारा न विज्ञापन कविता सत्य खोजता मेरा मन कविता न दर्शन न प्रदर्शन कविता अनंत से खेलता बचपन कव...