Friday, October 21, 2011

दीप उत्सव का मंगल गान


दीप उत्सव का मंगल गान
आस्था का ज्योतिर्मय आव्हान

बने वैभवशाली
पायें खुशहाली
समन्वय की बजे ताली
आनंद बढ़ाये दीवाली

रामजी के घर लौटने का मर्म
स्वयं से सर्वोत्तम की पहचान है
उजियारे का ये उमंग भरा पर्व
 सपने साकार करने का आव्हान है

मन का मधुर प्रेम से करे श्रृंगार
 हर स्थिति का आस से हो सत्कार
खनक रही है उत्साह की झंकार
दीपोत्सव पर ज्योतिर्मय नमस्कार


अशोक व्यास 

Wednesday, October 19, 2011

अनंत का आलिंगन



उसने कभी
छोड़ा ही नहीं था पिंजरा
नहीं जाना था
परिधि के परे पाँव रखने का अनुभव

और

पिंजरे से परे के जीवन को अपना मान लेने में
आज भी
संकोच था उसे


वह
मान ही नहीं पा रहा था
की दीवार के पार जो संसार है
उस विस्तार से भी कोइ सम्बन्ध है उसका
नहीं सोच पा रहा था
आकाश भी उसकी ऊंचाई की अंतिम सीमा नहीं है

पर
आज धीरे धीरे
अंतर्मन में उतरी 
एक दिव्य किरण ने
उसे पार करवा ही दिया
उन सभी परतों के
जिनके भीतर
सिमट सिमट कर
उसकी स्मृति से मिटने लगा था
अनंत का आलिंगन



अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
१९ अक्टूबर २०११                  

Tuesday, October 18, 2011

रस की धारा

 
जीवन प्यारा
रस की धारा
सांस-सांस में
है उजियारा



सार निखारा
तुम्हें पुकारा
हुआ उजागर
प्रेम हमारा


अशोक व्यास


Sunday, October 16, 2011

नई तरह गुनगुनाना


तस्वीर पुरानी
रखी है संभाल कर
बीते हुए क्षणों के साथ
बीत गए हैं
स्वाद जो अनुभव के,

उनको जगमगाना
अतीत में उतर जाना
अपने वर्तमान को
नई तरह से पाना
अपने भीतर की
संभावना को
नई तरह गुनगुनाना
अच्छा सा लगता है
एक विश्वास का
खिल जाना
कि
अब भी 
बनेगी बात
होगा कुछ ऐसा
अपने साथ,
जैसे तब होता है
जब प्यासी धरती से
मिल जाती 
बरसात
 
 
 
अशोक व्यास 
(सितम्बर २००८)
  
        

Saturday, October 15, 2011

एक दिव्य किरण



इससे पहले
की छुप जाए
सुन्दरतम,
आओ
गले लग
जाएँ हम,
थाम कर
रखें
एक दिव्य किरण
अपने बीच
जैसे ओजस्वी प्रण

जो भी हो
जैसा भी समय आये
याद रहे
अपनी अनमोल पहचान न जाए


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
         

Friday, October 14, 2011

अपने से आगे निकलना चाहता हूँ

जगजीत सिंह की गाई
क़तील शिफाई की लिखी ग़ज़ल
"अपने होठों पर सजाना चाहता हूँ
आ तुझे मैं गुनगुनाना चाहता हूँ"  
की बहर में कई बरस पहले चार शेर कहे थे
जगजीत सिंह की याद को समर्पित करते हुए
उनके प्रति श्रद्धा और प्रेम के साथ पेश हैं
(चिट्ठी ना  कोई  सन्देश …
जाने  वो  कौन  सा  देश,  जहा  तुम  चले  गए .. )


"अपने से आगे निकलना चाहता हूँ
मैं तुझे छूकर पिघलना चाहता हूँ

जिसकी बाँहों ने गगन थमा हुआ है
थाम कर उसको संभलना चाहता हूँ

जिसकी सूरत एक सी रहती हमेशा
मैं उसे क्यूं कर बदलना चाहता हूँ

जो किसी की आँख से देखा न जाए
मैं उसी रस्ते पे चलना चाहता हूँ


अपने से आगे निकलना चाहता हूँ
मैं तुझे छूकर पिघलना चाहता हूँ"

- अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका   

Thursday, October 13, 2011

ये चक्र


कितनी बार देखा है ये चक्र
कर्म
संतोष
अपेक्षा
जड़ता
छटपटाहट 
आलोडन विलोडन
मंथन

तिनके उठा कर
फिर से
अपेक्षा रहित होकर
गति की लय अपनाना
कर्म में जुट जाना
रिस रिस कर आते संतोष का स्वाद लेकर
तृप्त हो जाना




अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
१३ अक्टूबर २०११                 

Monday, October 10, 2011

हाथ उठा कर तोड़ो तारे


हाथ उठा कर तोड़ो तारे
मुट्ठी में हैं सुख-दुःख सारे

जिनके दिल में अपनापन है
वो सबको लगते हैं प्यारे

ख्वाब न छोडो बीच रास्ते
बहुत पास हैं उसके द्वारे

आग लगी बस्ती में कैसी
फिरते हैं सब मारे-मारे

मिल-2 कर सब खो जाना है
चाहे जीते- चाहे हारे


अशोक व्यास

कविता- २

और फिर 
धीरे धीरे
इस तरह
उतरा
एक दिन
सूरज ने
हाथ लगा कर
माथे पर
याद दिलाया
उजियारे का वह गीत
जो सजाया गया था
साँसों में



अशोक व्यास
         न्यूयार्क, अमेरिका           
      

Friday, October 7, 2011

आदतन मैंने तुम्हें पुकारा





उस दिन
आदतन तुम्हें याद कर लेने के बाद
जब
बदलता दिखा
हवाओं का रुख,
जब छू गया
खुशबू का एक झोंका मुझे,
जब
क्षितिज से किसी
अदृश्य हाथ ने बढ़ कर
गुदगुदा दिया मुझे,
जब
एकाएक भंवर खुद
कश्ती बन कर
मुझे पार पहुँचाने के
लिए प्रस्तुत हो
गर्वित हो गया सहसा,
जब
एकाएक मेरा अपने आपसे
रिश्ता
बदला-बदला
खिला-खिला
आश्वस्ति के उजाले में नहाया सा लगा
तब
मैं ने अपने आपको धन्यवाद दिया
कि
आदतन मैंने तुम्हें पुकारा
यानि
कोई एक आदत तो अच्छी है मेरी



अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका               

Thursday, October 6, 2011

मधुर मौन नगर तक




 
उस दिन
नन्हे बेटे ने पूछा
"भगवान् को हिचकी आती है क्या?"
उसने सुना था
जब कोई याद करता है
तो हिचकी आती है
 
 
उस दिन
नन्ही बिटिया ने कहा
"भगवान् अपने
सिवा किसी से बात नहीं करते.."
तब
माँ बोली
". क्योंकि उनके अलावा कोई है 
ही नहीं"
 
पिता ने
अपनी चेतना द्वारा
मधुर मौन नगर तक की यात्रा
के साक्षी बने रहे
 
 
 
अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका          


उमंगों का नया गीत







और तब
जब हर लहर
ठहर जाती है
स्थिर सागर से
आँख मिला कर
गंभीर हुआ मन
देख नहीं पाता
चिन्ह
किसी तरंग का,

सूनेपन की तोह लेता
मन
जला लेता है
नया दीपक
तुम्हारे नाम का


घाटी में
सहमे हुए फूलों को
नेहला दिया उसने
क्षितिज से उतारे
नए झरने में,

फूंक दिया
हवा में
उमंगों का नया गीत,
बाहें फैला कर
आतुर है
उड़ उड़ कर
अपनी अक्षय मस्ती में
झूम लेने को
तत्काल
 वह


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
               

Wednesday, October 5, 2011

सीमातीत पहचान





आत्म विश्वास
कभी धरती से उगता है
कभी आस्मां से
टपक जाता है
चोंच में दबा कर ले आती है
कोई चिड़िया
ना जाने कहाँ से

और वह विश्वास
जो भीतर से प्रस्फुटित होता है
जिसे लेकर मैं
तुम्हारी महिमा गाता हूँ

उस अनुभूति के दाता
फिर फिर
तुम्हारे द्वार पर
अपनी अक्षमता और अशक्यता लेकर
मेरे पहुँच जाने पर भी
तुमने आज तक कभी
रोष प्रकट नहीं किया

हर बार
मुझे भी 
अपनी तरह नया कर देते हो
दृष्टि मात्र से
ओ परम पिता कैसे

विस्मित हूँ
अपने होने पर
और
अपनी इस सीमातीत पहचान पर
जो तुमसे है 
और
दिखाई भी नहीं देती
ओ करूणामय! तुम्हारी कृपा दृष्टि बिना




अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
५ अक्टूबर २०११            

Tuesday, October 4, 2011

और वह कुछ क्या है..





(स्वामी ज्योतिर्मयानंद जी, फोटो- अशोक व्यास)

क्या सभी को होता है
ये अनुभव
चलते चलते
चलने और उड़ने के अंतर का मिट जाना

और कभी
धरती को पांवों के नीचे ना पाकर
घबरा जाना


क्या सभी को लगता है ऐसा
कि
जो दिखता है
उतना ही नहीं है जीवन,
और अनदेखे को
देख लेना चाहता हो मन,

क्या वह सब
जो होता है
सबके साथ
किसी स्तर पर 
साझा होकर भी साझा नहीं
 
हम एक संसार में रह कर
अपने-अपने, अलग-अलग संसार बनाते हैं
और जिस जगह पर जीते हैं
वो पूरी तरह किसी को दिखा नहीं पाते हैं

अपने अपने अनुभवों का स्वाद लेकर
एक दिन 
जब यहाँ से चले जाते हैं
अपनी अपनी दुनियां भी
साथ ले जाते हैं

और वह कुछ क्या है
जो अपनी तरफ से 
इस संसार में छोड़ पाते हैं
और वह कुछ क्या है
जो यहाँ से लौटते हुए
हम अपने साथ लेकर जाते हैं
अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
४ अक्टूबर 2011 
         

Sunday, October 2, 2011

तात्कालिक दर्द के पार



दर्द की रेखाएं
जब
फैलने लगती हैं
अनुभव की हथेली पर
सिमटता जाता है संसार

मुश्किल होता है
कुछ भी देख पाना
अपने तात्कालिक दर्द के पार

ऐसे में
करता हूँ पुकार
ओझल न हो
सृष्टि सार



अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
२ अक्टूबर 2011             

Saturday, October 1, 2011

बिना पतवार हिलाए



एक शांत क्षण की आभा के
प्रकटन में
फिर से
दीप्त है
कृतज्ञता की किरणें 

मैं
जैसे जैसे
देखता हूँ
शांति नदी की सतह पर
बिना पतवार हिलाए
आगे बढ़ती नाव अपनी

विस्मित होकर
देखता हूँ उसे
जो अदृश्य रह कर भी
बना है हमेशा साथ मेरे


अशोक व्यास
वर्जिनिया, अमेरिका
१ अक्टूबर २०११  
         

आनंदित निर्झर

छम छम बरसे प्रेमामृत सा खिला करूण अलोक अपरिमित मौन मधुर झीना झीना सा सरस सूक्ष्म  आनंदित निर्झर तन्मय बेसुध  लीन....  ...