Sunday, October 16, 2011

नई तरह गुनगुनाना


तस्वीर पुरानी
रखी है संभाल कर
बीते हुए क्षणों के साथ
बीत गए हैं
स्वाद जो अनुभव के,

उनको जगमगाना
अतीत में उतर जाना
अपने वर्तमान को
नई तरह से पाना
अपने भीतर की
संभावना को
नई तरह गुनगुनाना
अच्छा सा लगता है
एक विश्वास का
खिल जाना
कि
अब भी 
बनेगी बात
होगा कुछ ऐसा
अपने साथ,
जैसे तब होता है
जब प्यासी धरती से
मिल जाती 
बरसात
 
 
 
अशोक व्यास 
(सितम्बर २००८)
  
        

1 comment:

प्रवीण पाण्डेय said...

स्मृतियाँ भावनाओं का ज्वार लेकर आती हैं।

आनंदित निर्झर

छम छम बरसे प्रेमामृत सा खिला करूण अलोक अपरिमित मौन मधुर झीना झीना सा सरस सूक्ष्म  आनंदित निर्झर तन्मय बेसुध  लीन....  ...