Wednesday, October 19, 2011

अनंत का आलिंगन



उसने कभी
छोड़ा ही नहीं था पिंजरा
नहीं जाना था
परिधि के परे पाँव रखने का अनुभव

और

पिंजरे से परे के जीवन को अपना मान लेने में
आज भी
संकोच था उसे


वह
मान ही नहीं पा रहा था
की दीवार के पार जो संसार है
उस विस्तार से भी कोइ सम्बन्ध है उसका
नहीं सोच पा रहा था
आकाश भी उसकी ऊंचाई की अंतिम सीमा नहीं है

पर
आज धीरे धीरे
अंतर्मन में उतरी 
एक दिव्य किरण ने
उसे पार करवा ही दिया
उन सभी परतों के
जिनके भीतर
सिमट सिमट कर
उसकी स्मृति से मिटने लगा था
अनंत का आलिंगन



अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
१९ अक्टूबर २०११                  

1 comment:

प्रवीण पाण्डेय said...

तोड़ बंधन को समय के पार जाना है।

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