Thursday, January 26, 2012

स्थाई निवास

छूटने और छोड़ने का वक्त
सहसा
आ धमकता है
देहलीज़ पर जब
हम
मोहलत मांगते हैं
थोड़ी और तैय्यारी की

वह मुस्कुरा कर
मान भी जाता है
इधर-उधर टहल आता है
ये जानते हुए भी
की
हम अपने इसी घर को
स्थाई निवास मान कर
जीते जीते
इतने अभ्यस्त हो चले हैं
सब निर्देशांकों के
की
सजगता से
छोड़ने का हुनर
सीख ही नहीं पाते
जब तक की
वक्त का कोइ कारिन्दा
जबरन हाथ पकड़ कर
हमें दिखला दे
की
छोड़े बिना गति नहीं 

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
२६ जनवरी 2012

Tuesday, January 24, 2012

चेतना का यह वस्त्र

उसे सौंप दूं
चेतना का यह वस्त्र
सजगता से
सोच कर ऐसा
करके देख भी लिया प्रयोग

जब जब
अपने संकल्पों से अपना हाथ हटाया
जग को
पहले से बेहतर पाया
उसने कर दिया
सब सुन्दर
जो कभी नज़र नहीं आया

पर
अपने पर अपने अधिकार जताने
जब जब
मैं इठलाया
न जाने क्यूं
सौन्दर्य पर जैसे कोइ
पर्दा सा आया

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
२४ जन 2012


Monday, January 23, 2012

जिसका नाम 'विराट' है


अब भी क्या
उड़ सकता हूँ
तुम्हारे पंख उधार लेकर
ओ स्वप्निल चिड़िया

शिखर तक पहुँच कर भी
सीमा का बंधन
जो जकड़े है मुझे
क्या इसका निवास रहता है
तुम्हारे पंखों में भी
तब भी
जब तुम
धरती से इतनी ऊंचाई पर
अपने मौज में
हवा के साथ
नए नए ढंग से
सारी बस्ती को देखने का
अनूठा अनुभव पाती हो

तब क्या देखती हैं
तुम्हारी आँखें
इतनी गति
इतनी ऊंचाई

कहीं तब तुम्हें
कसक तो नहीं होती
की स्थिर होकर
किसी एक द्रश्य को
पूरी तरह अपना लेने की

शायद
मुक्ति
न गति में है
न स्थिरता में
मुक्ति इन दोनों से परे जहाँ है
वहां का द्वार
छुपा कर रखता है
हमारी आँखों से
वह
जो गति और स्थिरता के युगल बना कर
हमारे होने
और
हमारे 'न होने' से खेलता है

चिड़िया
तुम्हारे पंखों से नहीं
अपनी स्थिरता में ही
आवाहित करनी होगी
अपने गति मुझे

शायद किसी एक पल
उभर आये
वह संतुलन
जो मुझे
गति और स्थिरता दोनों से मुक्त कर दे
ऐसे
जैसे
तुम दोनों पंख फेहरा कर उड़ती हो
मैं भी
गति और स्थिरता के पंख
बना कर
उड़ पाऊँ
उस गगन में
जिसका नाम 'विराट' है

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
२३ जन २०१२ 

Saturday, January 21, 2012

ना वो क्षण बचता है

 कवितायेँ 
पहली तीन पुरानी
 जनवरी १३, २००५ को लिखी
अभी सामने आ गयी और उसके बाद एक आज लिखी हुई
या यूं करता हूँ
आज यानि २१ जनवरी २०१२ वाली पहले प्रस्तुत कर देता हूँ
ना वो क्षण बचता है
जिसमें हम
हँसते-हंसाते 
आईसक्रीम खाते हैं
ना वो क्षण रहता
जिसमें हम
एक दूसरे से रूठे
रोते-रुलाते हैं

ना वो क्षण रहते
जब आराम से
पोप-कोर्न  खाते
किसी फिल्म में डूब जाते हैं 
ना वो क्षण रहते
जब हम
सपनों की सीढ़ियों पर
डगमगा कर कसमसाते हैं

कुछ है हममें कि
सफलता-असफलता दोनों से
परे चले आते हैं
और लौटते हुए
अपने आप में 
जो, जैसा, जितना बचाते हैं
उसी से
अपने अनुभवों की रचना
करते चले जाते हैं
धीरे-धीरे जब
बचने-बचाने का संतुलित कौशल 
सीख जाते हैं
तो सहज ही
टूट-फूट से परे
अपनी परिपूर्णता में मगन हो जाते हैं 


बचता बस वो है
जिसे हम बचाते हैं
चाहें तो,मिटना छोड़ कर
अमिट हो जाते हैं 


हे राम!
हमारी अनुभूतियों का सच
कितनी जल्दी 
रंग बदल देता है
तो इस तरह
जो कुछ मेरा हुआ
या जिसके होने से
मैं पिघला, ढला, चला
वह सब अगर झूठ होता गया
तो फिर
मी होने का सच
क्या एक छल ही है
और अगर
सचमुच मैं हूँ ही नहीं
तो फिर
कौन लिख रहा है
---
बहुत हल्की बरसात
पेड़ों के बीच धुंध 
बिछा हुआ मौन
इस क्षण 
हर तरफ द्वार हैं
ख्हुलने को आतुर
यदि कोई 
प्रवेश करना चाहे
अनंत में
सहेज कर सुस्ती
चुपचाप पलों में

मैं
कुछ ना हुआ
देखता रहा
कुछ ना होने को
चुप की चुस्की के साथ
--
उसने देख लिया था
वहां तक
अन्दर की आँखों से,

दिखती है
उसकी आँखों  में
तरल करूणा
अपार वात्सल्य
शुद्धि
उजाला,

निर्मल होने की प्रार्थना लेकर
बैठा हूँ उसकी
तस्वीर के सामने
(रमण महर्षि जी को अर्पित)

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका 

Friday, January 20, 2012

उससे सम्बंधित होने के कारण

दिन के शुरू होने के साथ
मुझे अपनी गोद में
ले लेते हैं उसके हाथ

समय की पालकी पर
बिठा कर
वो मुझे
दिन भर घुमाता है
कभी खिलाता है
कभी खेल खेल में
कर्म का संतोष दिलाता है

कभी थपकियाँ देकर
बीच बाज़ार में
मुझे सुलाता है
मैं देखता हूँ
मेरी कुछ मांगे
वो पूरी करता जाता है
पर कई बार
मुस्कुरा कर
मेरे कहे को
टाल भी जाता है
मुझे सुरक्षा, शांति, संतोष
सब कुछ
उससे सम्बंधित होने के कारण 
मिल जाता है
पर कभी कभी सोचता हूँ
उसे मुझसे क्या
मिल पाता है?

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
२० जन 2012

Thursday, January 19, 2012

एक सूक्ष्म सा तंतु

यह एक सूक्ष्म सा तंतु
जो जोड़े रहता है
हमें
किसी सम्बन्ध
या
किसी कर्म की
लय से,

इस 
विस्मयकारी शक्ति को
निहारते हुए भी
नहीं पहचान पाता
इसके नित्य परिवर्तनशील स्वभाव का खेल 

कभी उन्नत लहर की तरह
मुझे धारण कर
चलता जाता है
यह तंतु
दिन प्रतिदिन
मुझे सृजन केंद्र बना कर
रचता जाता है
कुछ आल्हादकारी अभिव्यक्ति रूप

और 
कभी
सबसे असम्पृक्त कर मुझे
ना जाने
कहाँ
स्वयं भी
शांति, मगन अपनी पूर्णता में
सुस्ताता है 
ये
अनंत स्त्रोत से
शक्ति संचय करने
मुझसे दूरी बनाता है



अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
१९ जनवरी 2012               

Friday, January 13, 2012

गंतव्य का प्रश्न


गंतव्य का प्रश्न
जब 
नए सिरे से
अजगर की तरह
निगलने को होता है
अब तक
संजोया संतुलन और शांति ,

तब
इस मायावी तिलिस्म में
घुस कर
सामूहिक विनाश का
निमंत्रण स्वीकार करते हुए
सुरक्षा की आश्वस्ति देता है
एक तुम्हारा साथ

क्या ये सही नहीं
की 
तुम ही गंतव्य हो
ओ गोपाल
जो क्षण क्षण साथ रह कर
छुप जाने का खेल खेलते हो

फिर
ये 
पाने और खोने के बंधन
ये
स्वीकारने का मद
और अस्वीकार कर दिए जाने की कटुता
ये सब
जिस तरह ढहा देते हैं
बरसों से बटोरी स्थिरता

क्या ये सब
इसलिए
की तुम
ठठा कर हंस सको
मुझ पर
या अपनी ही क्रीडा पर हँसते हो तुम
की मुझ पर
अपना रंग चढाने के खेल में
पूरी तरह सफल नहीं हुए
 तुम 
अब तक

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
१३ जनवरी २०१२ 





Thursday, January 12, 2012

'अब भी कुछ संशय है?'

 
और फिर
मैंने महसूस किया
उसके होने का असर
अपने ह्रदय में
उतर आई 
शीतलता अनुपम
जैसे
बैकुंठ का आविर्भाव
जैसे संतोष का अद्वितीय धन
जैसे 
पर्वत शिखर चूम कर
मेरी गोद में
उतर आई
निश्छल परी से
नन्ही किरण
 
जैसे
आश्वस्ति का अभिषेक करवा कर
मुस्कुराया हो
वह
और करूणामय नयनो से
पूछ रहा हो मुझसे
'अब भी कुछ संशय है?'
 
 
अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
१२ जनवरी २०१२          

Wednesday, January 11, 2012

विराट के श्री चरणों में

 
सुबह सुबह 
पावन गंगा में
डुबकी लगा कर
श्रद्धा, आनंद, स्फूर्ति जगाने के साथ-साथ
शाश्वत से चिर सम्बन्ध की स्मृति-सौरभ में
तन्मय हो जाने
के मंगल क्रम की तरह
वह
हर दिन
भागीरथ की तरह
आव्हान करता है
अंतस-गंगा का
और फिर
भीग कर
अमृतमय प्रवाह में
छोड़ देता है
अपनी पहचान के
छोटे छोटे चिन्ह
 
कविता उसके लिए
स्वयं को
छोड़ कर
स्वयं को 
पा लेने का
एक अद्वितीय माध्यम है
 
और
किसी किसी क्षण
जब वह 
खोने-पाने से परे
स्वयं एक कविता हो जाता है
विराट के श्री चरणों में अर्पित हो पाता है
 
 
अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
११ जन २०१२        
   

Tuesday, January 10, 2012

उजियारे के साथ




जहाँ हूँ
जैसे हूँ
देख कर खिड़की से
धूप के फैले हुए हजारों हाथ
उजियारे के साथ मुस्कुराता हूँ
पेड़ों की नंगी शाखाओं से 
आँख मिलाता हूँ 
वसंत के दिनों की
याद दिलाता हूँ
अपने हिस्से की 
हरियाली लेकर
सपनो के
नए बगीचे लगाता हूँ

कितने मौसम
बदलते जाते हैं 
मेरे भीतर
और मैं 
तुम्हारा नाम में धरे
 शाश्वत के साथ 
खिलखिलाता हूँ

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका 
१० जनवरी २०१२ 

Monday, January 9, 2012

सामान्य सी गतिविधियाँ

 
बरसों से
हर दिन
सूर्य किरण के साथ
मंदिर की सीढियां धोने का क्रम
एक दिन
बंद करके उसने फिर जाना
 
यह क्रिया
 
बाल्टी उठाना
कुएं से पानी निकलना
मंदिर की सीढ़ियों तक ले जाना
पानी छिड़कना
मंदिर से आती घंटी की ध्वनि से साथ
सामने 
बरगद के पेड़ पर कबूतरों की हलचल देखना
किसी किसी को
'राम राम' कह देना
 
ये सब
सहज
सामान्य सी गतिविधियाँ
बरसों से
सुनहरा बनाती रही हैं
उसका सारा दिन
 
 
अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
९ जनवरी २०१२                

Sunday, January 8, 2012

एक अदृश्य प्रसन्नता


 
और फिर
कुछ दिन रास्ता बदल देने के बाद
उसे समझ में आया
गुलमोहर के पेड़ से
उसके हर दिन का 
एक गहरा सम्बन्ध है
 
पार्क के किनारे
कबूतरों को चुग्गा देने से
बिछा करती है
एक अदृश्य प्रसन्नता
उसके मन में
सारे दिन
 
और
स्कूल जाते बच्चों को
मुस्कुरा कर हाथ हिलाना भी
एक ऐसी क्रिया है
जो निश्छल रस घोल देती है
उसकी साँसे में
 
कुछ दिन रास्ता बदलने के बाद
फिर पुराने रास्ते पर
आकर
उसे यूं लगा
जैसे अपने जीवन से
फिर हो गयी मुलाक़ात
 
 
अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
८ जनवरी २०११             

Saturday, January 7, 2012

सतर्क हथेलियों के बीच

 
हथेलियों के बीच
सहेज कर रखना
लौ दिए की
जीवन जैसी
जगमग करती
पथ को उजियारे का स्नान करवाती
झूमती है
आस्था की लय पर
सुनाती है
सदियों पुराना
शाश्वत गान
 
शक्ति संचरित होती है
हर संकट सह जाने की
इस लौ से
जो
सुरक्षित है
सतर्क हथेलियों के बीच
 
असावधान होने पर
बुझ भी सकती है
अब सोचने वाली बात ये है 
की 
तुम्हारी सुरक्षा
इस पथ प्रदर्शित लौ से है
या फिर
तुम्हारे अपनी सतर्कता से
 
 
अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका 
७ जनवरी २०१२                 

Friday, January 6, 2012

समय की परिधि लांघ कर


इतने दिनों बाद
फिर यहाँ से देख रहा हूँ
जब तुम्हें
नयेपन का उजियारा
छिटका है
इस छोर से उस छोर तक

मेरी मुस्कान में
उपहार से खनक रहे हैं
उसकी स्मृति के

हर तरफ
उसे देखना नहीं हो रहा पर
कण कण
दे रहा है आश्वस्ति
उसके होने की

अब भी
मौन आलिंगनबद्ध कर मुझे
तत्पर है
उसके परम शांति नगर में ले जाने को
जहाँ 
शब्द अपना आकार छोड़ कर
लीन हो जाते हैं
सीमा रहित अर्थ प्रवाह में

यह लबालब आनंद
मुझसे हो न हो
मुझमें भी है तो अवश्य
जैसे की तुममें भी है
तभी तो 
ये शब्द
अनर्गल प्रलाप नहीं
अर्थपूर्ण संकेत से भरे लग रहे हैं तुम्हें

और तुम्हारे लिए ही है
यह निमंत्रण
चलें
मौन के द्वार से
अपने अपने आनंद का उत्सव मनाएं
कुछ देर
समय की परिधि लांघ कर
स्वयं को छू आयें

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका 
६ जनवरी २०११ 

आनंदित निर्झर

छम छम बरसे प्रेमामृत सा खिला करूण अलोक अपरिमित मौन मधुर झीना झीना सा सरस सूक्ष्म  आनंदित निर्झर तन्मय बेसुध  लीन....  ...