Thursday, January 12, 2012

'अब भी कुछ संशय है?'

 
और फिर
मैंने महसूस किया
उसके होने का असर
अपने ह्रदय में
उतर आई 
शीतलता अनुपम
जैसे
बैकुंठ का आविर्भाव
जैसे संतोष का अद्वितीय धन
जैसे 
पर्वत शिखर चूम कर
मेरी गोद में
उतर आई
निश्छल परी से
नन्ही किरण
 
जैसे
आश्वस्ति का अभिषेक करवा कर
मुस्कुराया हो
वह
और करूणामय नयनो से
पूछ रहा हो मुझसे
'अब भी कुछ संशय है?'
 
 
अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
१२ जनवरी २०१२          

1 comment:

प्रवीण पाण्डेय said...

संशय सब मिट जाने ही हैं।

आनंदित निर्झर

छम छम बरसे प्रेमामृत सा खिला करूण अलोक अपरिमित मौन मधुर झीना झीना सा सरस सूक्ष्म  आनंदित निर्झर तन्मय बेसुध  लीन....  ...