Friday, January 13, 2012

गंतव्य का प्रश्न


गंतव्य का प्रश्न
जब 
नए सिरे से
अजगर की तरह
निगलने को होता है
अब तक
संजोया संतुलन और शांति ,

तब
इस मायावी तिलिस्म में
घुस कर
सामूहिक विनाश का
निमंत्रण स्वीकार करते हुए
सुरक्षा की आश्वस्ति देता है
एक तुम्हारा साथ

क्या ये सही नहीं
की 
तुम ही गंतव्य हो
ओ गोपाल
जो क्षण क्षण साथ रह कर
छुप जाने का खेल खेलते हो

फिर
ये 
पाने और खोने के बंधन
ये
स्वीकारने का मद
और अस्वीकार कर दिए जाने की कटुता
ये सब
जिस तरह ढहा देते हैं
बरसों से बटोरी स्थिरता

क्या ये सब
इसलिए
की तुम
ठठा कर हंस सको
मुझ पर
या अपनी ही क्रीडा पर हँसते हो तुम
की मुझ पर
अपना रंग चढाने के खेल में
पूरी तरह सफल नहीं हुए
 तुम 
अब तक

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
१३ जनवरी २०१२ 





2 comments:

प्रवीण पाण्डेय said...

रंग चढ़ेगा धीरे धीरे..

Amrita Tanmay said...

बहुत बढ़िया

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