Tuesday, January 24, 2012

चेतना का यह वस्त्र

उसे सौंप दूं
चेतना का यह वस्त्र
सजगता से
सोच कर ऐसा
करके देख भी लिया प्रयोग

जब जब
अपने संकल्पों से अपना हाथ हटाया
जग को
पहले से बेहतर पाया
उसने कर दिया
सब सुन्दर
जो कभी नज़र नहीं आया

पर
अपने पर अपने अधिकार जताने
जब जब
मैं इठलाया
न जाने क्यूं
सौन्दर्य पर जैसे कोइ
पर्दा सा आया

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
२४ जन 2012


2 comments:

प्रवीण पाण्डेय said...

अपने से मिलने के लिये न जाने कितनी बाधायें पार करनी पड़ती हैं..

Rakesh Kumar said...

जब जब
अपने संकल्पों से अपना हाथ हटाया
जग को
पहले से बेहतर पाया
उसने कर दिया
सब सुन्दर
जो कभी नज़र नहीं आया

सब सुन्दर था,सब सुन्दर है
सब सुन्दर होगा.

क्यूंकि आपका असल स्वरुप सुन्दर ही
तो है.

मेरे ब्लॉग पर आईयेगा,अबकी बार
साक्षात आईयेगा.आपके सुन्दर स्वरुप से
मेरा ब्लॉग सुंदरता के दर्शन कर सकेगा.

आनंदित निर्झर

छम छम बरसे प्रेमामृत सा खिला करूण अलोक अपरिमित मौन मधुर झीना झीना सा सरस सूक्ष्म  आनंदित निर्झर तन्मय बेसुध  लीन....  ...