Tuesday, January 10, 2012

उजियारे के साथ




जहाँ हूँ
जैसे हूँ
देख कर खिड़की से
धूप के फैले हुए हजारों हाथ
उजियारे के साथ मुस्कुराता हूँ
पेड़ों की नंगी शाखाओं से 
आँख मिलाता हूँ 
वसंत के दिनों की
याद दिलाता हूँ
अपने हिस्से की 
हरियाली लेकर
सपनो के
नए बगीचे लगाता हूँ

कितने मौसम
बदलते जाते हैं 
मेरे भीतर
और मैं 
तुम्हारा नाम में धरे
 शाश्वत के साथ 
खिलखिलाता हूँ

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका 
१० जनवरी २०१२ 

1 comment:

प्रवीण पाण्डेय said...

वह चिरजीवन वह नित नवीन..

वहाँ जो मौन है सुंदर

वह जो लिखता लिखाता है कहाँ से हमारे भीतर आता है कभी अपना चेहरा बनाता कभी अपना चेहरा छुपाता है वह जो है शक्ति प्रदाता  ...